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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 8

अध्याय 6 · श्लोक 8

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८॥

jñāna-vijñāna-tṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ | yukta ity ucyate yogī sama-loṣṭāśma-kāñcanaḥ ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा: ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला; कूटस्थः: सबसे ऊपर स्थित; विजितेन्द्रियः: जीती हुई इन्द्रियों वाला; युक्तः: योगी; इति: इस प्रकार; उच्यते: कहा जाता है; योगी: योगी; समलोष्टाश्मकाञ्चनः: मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला, कूटस्थ (अपरिवर्तनीय), जितेन्द्रिय और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान देखने वाला है, वह योगी युक्त (समाधिस्थ) कहा जाता है।

English Translation

One who is satisfied with knowledge and realization, who is unchanging, who has conquered the senses, and to whom a clod of earth, a stone and gold are the same, is said to be a yogi in trance (yukta).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ योगी के उच्चतम लक्षण बताए गए हैं: ज्ञान-विज्ञान से संतुष्ट, स्थिर, जितेन्द्रिय, और सब वस्तुओं में समभाव रखने वाला।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।