ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 8

श्लोक ८ में सिद्ध योगी के लक्षण बताए गए हैं, जो सबमें समान भाव रखता है।

संस्कृत श्लोक

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८॥

jñāna-vijñāna-tṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ | yukta ity ucyate yogī sama-loṣṭāśma-kāñcanaḥ ||8||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा: ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला; कूटस्थः: सबसे ऊपर स्थित; विजितेन्द्रियः: जीती हुई इन्द्रियों वाला; युक्तः: योगी; इति: इस प्रकार; उच्यते: कहा जाता है; योगी: योगी; समलोष्टाश्मकाञ्चनः: मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखने वाला।

हिंदी अनुवाद

जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अन्तःकरण वाला, कूटस्थ (अपरिवर्तनीय), जितेन्द्रिय और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान देखने वाला है, वह योगी युक्त (समाधिस्थ) कहा जाता है।

English Translation

One who is satisfied with knowledge and realization, who is unchanging, who has conquered the senses, and to whom a clod of earth, a stone and gold are the same, is said to be a yogi in trance (yukta).

टीका / Commentary

यहाँ योगी के उच्चतम लक्षण बताए गए हैं: ज्ञान-विज्ञान से संतुष्ट, स्थिर, जितेन्द्रिय, और सब वस्तुओं में समभाव रखने वाला।