श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 7

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 38 मिनट का पठन 164 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
जितात्मनः
जीते हुए मन वाले
प्रशान्तस्य
शांत पुरुष के
परमात्मा
परमात्मा
समाहितः
सम्यक् रूप से स्थित
शीतोष्णसुखदुःखेषु
सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख में
तथा
तथा
मानापमानयोः
मान-अपमान में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिसने मन को जीत लिया है और जो शान्त है, उसका परमात्मा में सम्यक् रूप से स्थित हो जाता है, वह शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में भी समान रहता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग या आत्मसंयमयोग) का यह सातवां श्लोक मानव चेतना को सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त कर परमेश्वर में लीन करने का एक दिव्य महामंत्र है। इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को उस अवस्था का दिग्दर्शन करा रहे हैं, जहाँ पहुँचकर एक साधक का मन पूर्णतः शांत हो जाता है और वह परमात्मा के साक्षात स्वरूप का अनुभव करने लगता है। भारतीय संस्कृति और वैदिक वास्तुकला में मन को वश में करने को ही सबसे बड़ी विजय माना गया है। जब तक हमारा मन बाहरी परिस्थितियों—जैसे अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दुःख, मान-अपमान—के थपेड़ों से विचलित होता रहता है, तब तक हम अशांत रहते हैं।

इस श्लोक का ब्रह्मांडीय महत्व यह है कि यह हमें सूक्ष्म जगत (आंतरिक मन) और स्थूल जगत (बाहरी परिस्थितियां) के बीच संतुलन स्थापित करना सिखाता है। जब साधक अपने अंतःकरण को जीत लेता है, तो उसकी व्यक्तिगत चेतना (जीवात्मा) का समष्टिगत चेतना (परमात्मा) के साथ सहज समागम हो जाता है। यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक जीवन-पद्धति है जो आधुनिक युग के तनाव, अवसाद और मानसिक अस्थिरता से जूझ रहे मनुष्यों के लिए एक संजीवनी बूटी के समान है। इस पावन श्लोक के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे आत्म-विजय के द्वारा हम उस परम शांति को प्राप्त कर सकते हैं जो हर परिस्थिति में अडिग रहती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥"

रोमन लिप्यंतरण (Transliteration):

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ || 7 ||

पठन एवं साधना की शास्त्रीय विधि:

इस महामंत्र का जप और मनन करने के लिए शास्त्रों में एक विशिष्ट विधि बताई गई है, जिसका पालन करने से साधक को शीघ्र ही मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है:

  • समय: इस श्लोक के मनन और जप के लिए सर्वोत्तम समय 'ब्रह्ममुहूर्त' (प्रातः ४:०० से ५:३० बजे) माना गया है, जब प्रकृति शांत होती है।
  • आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पूर्व ३ से ५ बार गहरे प्राणायाम (अनुलोम-विलोम) करें ताकि श्वास की गति स्थिर हो सके।
  • ध्यान का केंद्र: अपने आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के बीच) या अनाहत चक्र (हृदय के मध्य) पर ध्यान केंद्रित करते हुए श्लोक का मंद और सुस्पष्ट उच्चारण करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
जितात्मनः (Jitātmanaḥ) जिसने अपने मन और इंद्रियों को जीत लिया है। यह उस साधक का सूचक है जिसने अभ्यास और वैराग्य के बल पर अपनी चंचल इंद्रियों और अनियंत्रित मन पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है।
प्रशान्तस्य (Praśāntasya) जो अत्यंत शांत और विकाररहित हो चुका है। मन की वह अवस्था जहाँ कामनाओं की तरंगें शांत हो चुकी हैं। जैसे वायुहीन स्थान पर दीपक की लौ स्थिर रहती है, वैसे ही उसका अंतःकरण शांत रहता है।
परमात्मा (Paramātmā) परमेश्वर, सर्वोच्च चेतना। सृष्टि का मूल आधार, जो प्रत्येक जीव के भीतर साक्षी रूप में विराजमान है। यहाँ परमात्मा का अर्थ आत्म-साक्षात्कार की पराकाष्ठा से है।
समाहितः (Samāhitaḥ) भली-भांति स्थित या समाधिस्थ होता है। इसका अर्थ है कि परमात्मा उसके अंतःकरण में सदा के लिए प्रकट और स्थापित हो जाते हैं। साधक को हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।
शीतोष्ण (Śītoṣṇa) सर्दी और गर्मी में (भौतिक परिस्थितियां)। यह प्रकृति के भौतिक द्वंद्वों का प्रतीक है। अनुकूल और प्रतिकूल मौसम या शारीरिक सुख-असुविधाओं में भी साधक का विचलित न होना।
सुखदुःखेषु (Sukhaduḥkheṣu) सुख और दुःख के समय (मानसिक अवस्थाएं)। जीवन के हर्ष और शोक की घड़ियों में समभाव रखना। न तो सुख में अत्यधिक हर्षित होना और न ही दुःख में हताश होना।
तथा (Tathā) और, उसी प्रकार। यह शब्द विभिन्न द्वंद्वों के बीच निरंतरता और समानता को जोड़ने का कार्य करता है।
मानापमानयोः (Mānāpamānayoḥ) मान और अपमान में (सामाजिक परिस्थितियां)। संसार द्वारा दी जाने वाली प्रतिष्ठा या की जाने वाली निंदा, दोनों को समान भाव से स्वीकार करना। यह अहंकार की समाप्ति का सूचक है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के भीषण युद्ध क्षेत्र कुरुक्षेत्र से जुड़ी हुई है। युद्ध के मुहाने पर खड़े अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखते हैं, तो उनका मन मोह और विषाद से घिर जाता है। वे अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और रथ के पिछले भाग में बैठ जाते हैं। अर्जुन की यह स्थिति किसी भी उस साधारण मनुष्य की तरह है जो जीवन के संघर्षों से घबराकर पलायन करना चाहता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस मानसिक द्वंद्व को दूर करने के लिए उन्हें निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग और अंततः ध्यानयोग का उपदेश देते हैं।

अध्याय ६ के प्रारंभ में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि बिना मन को जीते कोई भी व्यक्ति योगी नहीं बन सकता। इससे ठीक पिछले श्लोक (अध्याय ६, श्लोक ६) में भगवान कहते हैं कि "जिसने मन को जीत लिया है, उसका मन उसका सबसे अच्छा मित्र है; लेकिन जो ऐसा नहीं कर पाया, उसका मन उसका सबसे बड़ा शत्रु बना रहता है।" इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए श्लोक ७ में श्रीकृष्ण बताते हैं कि मन को जीतने का परिणाम क्या होता है।

पौराणिक आख्यानों में राजा जनक का प्रसंग इस श्लोक का सबसे सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजा जनक को 'विदेह' कहा जाता था क्योंकि वे महलों में रहते हुए और राजपाठ संभालते हुए भी पूरी तरह से अनासक्त थे। एक बार उनके गुरु महर्षि अष्टावक्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिए मिथिला नगरी में आग लगने का भ्रम पैदा किया। सभी लोग अपनी संपत्ति बचाने के लिए भागे, लेकिन राजा जनक शांत भाव से अपने स्थान पर बैठे रहे। उन्होंने कहा, "मिथिलायाम प्रदीप्तायाम न मे दह्यति किंचन" (यदि मिथिला जल भी जाए, तो मेरा कुछ नहीं जलता, क्योंकि मैं आत्मा हूँ, शरीर या संपत्ति नहीं)। राजा जनक की यही अवस्था 'जितात्मनः प्रशान्तस्य' की साक्षात प्रतिमूर्ति है।

वैदिक दर्शन के अनुसार, जब तक जीव अविद्या (अज्ञान) के कारण स्वयं को शरीर मानता है, तब तक वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान से प्रभावित होता रहता है। लेकिन जैसे ही वह ज्ञान के प्रकाश से अपने मन को वश में कर लेता है, वह जान जाता है कि ये सभी द्वंद्व केवल शरीर और मन के स्तर पर हैं, आत्मा इनसे सर्वथा परे है। यही इस श्लोक की शाश्वत और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का नियमित रूप से पाठ, मनन और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

  • १. मानसिक शांति की त्वरित प्राप्ति

    यह श्लोक मन की चंचलता को शांत कर अवसाद और मानसिक तनाव को दूर करने में अत्यंत सहायक है।

  • २. द्वंद्वों को सहने की शक्ति

    साधक में जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख और विपरीत परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करने की क्षमता विकसित होती है।

  • ३. आत्म-नियंत्रण और इच्छाशक्ति का विकास

    इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है, जिससे बुरी आदतों और व्यसनों से मुक्ति पाना अत्यंत सरल हो जाता है।

  • ४. मान-अपमान के भय से मुक्ति

    दूसरों की आलोचना या प्रशंसा का साधक के मन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे वह सदैव प्रसन्न रहता है।

  • ५. ईश्वरीय चेतना से जुड़ाव

    नियमित चिंतन से साधक के भीतर 'परमात्मा समाहितः' की अवस्था जाग्रत होती है, जिससे ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति का उदय होता है।

  • ६. सकारात्मक आभा मंडल (Aura) का निर्माण

    इस श्लोक के स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का क्षेत्र निर्मित होता है।

  • ७. संचित कर्मों की शुद्धि

    समत्व भाव में जीने से नए कर्मबंध नहीं बनते और पुराने संचित पाप कर्मों का धीरे-धीरे क्षय होने लगता है।

  • ८. शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार

    मानसिक शांति का सीधा प्रभाव शरीर पर पड़ता है, जिससे रक्तचाप, अनिद्रा और हृदय संबंधी विकारों में लाभ मिलता है।

  • ९. ध्यान में प्रगाढ़ता

    जो साधक ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनके लिए यह श्लोक समाधि की अवस्था को सुलभ बनाने वाला मार्गदर्शक है।

  • १०. परम आनंद की अनुभूति

    सांसारिक क्षणभंगुर सुखों से ऊपर उठकर साधक उस अतींद्रिय आनंद का रसास्वादन करता है जो कभी समाप्त नहीं होता।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के विद्वान संस्कृत भाषाविदों, वेदांत आचार्यों और आध्यात्मिक शोधकर्ताओं की टीम द्वारा तैयार की गई संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस व्याख्या का मुख्य आधार प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) के अंतर्गत आदि शंकराचार्य जी के 'गीता भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद जी की व्याख्याओं और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों से लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शास्त्रों के शुद्ध और व्यावहारिक ज्ञान को सरल भाषा में पहुँचाना है। यह सामग्री पूरी तरह से आध्यात्मिक शोध, भाषाई विश्लेषण और साधकों के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

दैनिक जीवन में हम हर दिन अनेक प्रकार की परिस्थितियों से गुजरते हैं—कभी ऑफिस में तारीफ (मान) मिलती है तो कभी आलोचना (अपमान)। कभी व्यापार में लाभ (सुख) होता है तो कभी हानि (दुःख)। यह श्लोक हमें सिखाता है कि इन बाहरी परिस्थितियों के कारण हमें अपनी मानसिक शांति नहीं खोनी चाहिए। जब हम यह समझ जाते हैं कि ये सब क्षणिक हैं, तो हम हर परिस्थिति में स्थिर रहकर सही निर्णय ले पाते हैं।

'जितात्मा' यानी अपने मन को जीतने की शुरुआत छोटी-छोटी चीजों से होती है। पहला कदम है—अपनी जीभ और वाणी पर नियंत्रण। सात्विक भोजन ग्रहण करना और व्यर्थ की गपशप या निंदा से बचना। इसके बाद, प्रतिदिन कम से कम १०-१५ मिनट मौन रहने और ध्यान करने का अभ्यास करना चाहिए। धीरे-धीरे अभ्यास (Abhyasa) और वैराग्य (Detachment) से मन वश में होने लगता है।

हाँ, यह पूरी तरह संभव है, लेकिन इसके लिए दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता होती है। जब हम यह जान लेते हैं कि मान और अपमान दोनों ही अहंकार (Ego) की तुष्टि या आहत होने के रूप हैं, और हमारा वास्तविक स्वरूप 'आत्मा' इन दोनों से परे है, तब हम इनसे अप्रभावित रहने लगते हैं। जैसे समुद्र में कितनी ही नदियाँ आकर मिलें, वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी दोनों स्थितियों में शांत रहता है।

'परमात्मा समाहितः' का अर्थ है कि जब साधक का मन पूरी तरह से शांत और वश में हो जाता है, तब उसके अंतःकरण में परमात्मा का स्वतः ही प्राकट्य हो जाता है। जैसे गंदे या हिलते हुए पानी में चंद्रमा का प्रतिबिंब साफ दिखाई नहीं देता, लेकिन शांत और स्वच्छ पानी में चंद्रमा स्पष्ट दिखाई देता है; उसी प्रकार शांत मन में परमात्मा की उपस्थिति का साक्षात अनुभव होने लगता है।

यह श्लोक गृहस्थों के लिए और भी अधिक उपयोगी है। गृहस्थ जीवन में कदम-कदम पर द्वंद्व, जिम्मेदारियां और तनाव होते हैं। एक गृहस्थ को परिवार चलाने, नौकरी या व्यवसाय करने के लिए मानसिक रूप से सुदृढ़ होना आवश्यक है। इसलिए, गृहस्थ जीवन में रहते हुए इस श्लोक के सिद्धांतों को अपनाकर व्यक्ति बिना विचलित हुए अपने कर्तव्यों का सर्वोत्तम निर्वहन कर सकता है।

॥ हरि ॐ तत्सत् ॥

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक को अपने जीवन में उतारें। आज ही से अपने मन को अपना मित्र बनाने का संकल्प लें और हर परिस्थिति में समभाव रखने का प्रयास करें।

जय श्री कृष्ण!

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिस व्यक्ति ने मन को जीत लिया है और जो शांत है, वह परमात्मा में स्थित हो जाता है। वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमान में समान रहता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग की कसौटी है – द्वंद्वों में समता। जो इस समता को प्राप्त कर लेता है, वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/47 15% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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