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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 6

अध्याय 6 · श्लोक 6

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६॥

bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanas tu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

बन्धुः: मित्र; आत्मा: अपना स्वयं; आत्मनः: अपने; तस्य: उसका; येन: जिसके द्वारा; आत्मा: मन; एव: ही; आत्मना: अपने द्वारा; जितः: जीत लिया गया है; अनात्मनः: जिसने अपने को नहीं जीता है; तु: तो; शत्रुत्वे: शत्रुता में; वर्तेत: वर्तता है; आत्मा: वही मन; एव: ही; शत्रुवत्: शत्रु के समान।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र है; और जिसने मन को नहीं जीता है, उसके लिए वही मन शत्रु के समान आचरण करता है।

English Translation

For one who has conquered the mind, the mind is the best of friends; but for one who has failed to do so, the mind will remain the greatest enemy.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ आगे कहा गया है कि जिसने मन को जीत लिया, उसके लिए मन परम मित्र है; जो नहीं जीत सका, उसके लिए वही शत्रु बन जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।