ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 6

श्लोक ६ में बताया गया है कि मन को जीतने वाले के लिए वह मित्र और न जीतने वाले के लिए शत्रु है।

संस्कृत श्लोक

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६॥

bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanas tu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||6||

पदच्छेद / शब्दार्थ

बन्धुः: मित्र; आत्मा: अपना स्वयं; आत्मनः: अपने; तस्य: उसका; येन: जिसके द्वारा; आत्मा: मन; एव: ही; आत्मना: अपने द्वारा; जितः: जीत लिया गया है; अनात्मनः: जिसने अपने को नहीं जीता है; तु: तो; शत्रुत्वे: शत्रुता में; वर्तेत: वर्तता है; आत्मा: वही मन; एव: ही; शत्रुवत्: शत्रु के समान।

हिंदी अनुवाद

जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह मन सबसे अच्छा मित्र है; और जिसने मन को नहीं जीता है, उसके लिए वही मन शत्रु के समान आचरण करता है।

English Translation

For one who has conquered the mind, the mind is the best of friends; but for one who has failed to do so, the mind will remain the greatest enemy.

टीका / Commentary

यहाँ आगे कहा गया है कि जिसने मन को जीत लिया, उसके लिए मन परम मित्र है; जो नहीं जीत सका, उसके लिए वही शत्रु बन जाता है।