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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 5

अध्याय 6 · श्लोक 5

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५॥

uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

उद्धरेत्: उद्धार करे; आत्मना: अपने द्वारा; आत्मानम्: अपना; न: नहीं; आत्मानम्: अपने को; अवसादयेत्: गिराए; आत्मा: अपना स्वयं; एव: ही; हि: निश्चय ही; आत्मनः: अपना; बन्धुः: मित्र; आत्मा: स्वयं; एव: ही; रिपुः: शत्रु; आत्मनः: अपना।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।

English Translation

One should raise oneself by one's own mind; one should not degrade oneself. For the mind alone is one's friend, and the mind alone is one's enemy.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र या शत्रु हो सकता है। यदि हम मन को वश में कर लें तो वह हमारा उद्धार करता है, अन्यथा वही हमें पतन की ओर ले जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।