ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 5

श्लोक ५ में कहा गया है कि मन ही मनुष्य का मित्र और शत्रु है।

संस्कृत श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५॥

uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||5||

पदच्छेद / शब्दार्थ

उद्धरेत्: उद्धार करे; आत्मना: अपने द्वारा; आत्मानम्: अपना; न: नहीं; आत्मानम्: अपने को; अवसादयेत्: गिराए; आत्मा: अपना स्वयं; एव: ही; हि: निश्चय ही; आत्मनः: अपना; बन्धुः: मित्र; आत्मा: स्वयं; एव: ही; रिपुः: शत्रु; आत्मनः: अपना।

हिंदी अनुवाद

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु है।

English Translation

One should raise oneself by one's own mind; one should not degrade oneself. For the mind alone is one's friend, and the mind alone is one's enemy.

टीका / Commentary

हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र या शत्रु हो सकता है। यदि हम मन को वश में कर लें तो वह हमारा उद्धार करता है, अन्यथा वही हमें पतन की ओर ले जाता है।