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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 4

अध्याय 6 · श्लोक 4

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४॥

yadā hi nendriyārtheṣu na karmasv anuṣajjate | sarva-saṅkalpa-sannyāsī yogārūḍhas tadocyate ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यदा: जब; हि: निश्चय ही; न: नहीं; इन्द्रियार्थेषु: इन्द्रियों के विषयों में; न: नहीं; कर्मसु: कर्मों में; अनुषज्जते: आसक्त होता है; सर्वसंकल्पसंन्यासी: सब संकल्पों का त्यागी; योगारूढः: योगारूढ़; तदा: तब; उच्यते: कहा जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों में और कर्मों में आसक्त नहीं होता और सब संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहा जाता है।

English Translation

When one is not attached to sense objects or to actions, having renounced all thoughts (saṅkalpas), then he is said to be established in yoga.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योगारूढ़ वह है जो इन्द्रिय विषयों और कर्मों दोनों से अलिप्त रहता है, तथा सभी प्रकार के संकल्पों (इच्छाओं और कल्पनाओं) का त्याग कर चुका है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।