ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 4
श्लोक ४ में योगारूढ़ की पहचान बताई गई है: वह विषयों और कर्मों से अनासक्त रहता है।
संस्कृत श्लोक
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasv anuṣajjate | sarva-saṅkalpa-sannyāsī yogārūḍhas tadocyate ||4||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यदा: जब; हि: निश्चय ही; न: नहीं; इन्द्रियार्थेषु: इन्द्रियों के विषयों में; न: नहीं; कर्मसु: कर्मों में; अनुषज्जते: आसक्त होता है; सर्वसंकल्पसंन्यासी: सब संकल्पों का त्यागी; योगारूढः: योगारूढ़; तदा: तब; उच्यते: कहा जाता है।
हिंदी अनुवाद
जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों में और कर्मों में आसक्त नहीं होता और सब संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहा जाता है।
English Translation
When one is not attached to sense objects or to actions, having renounced all thoughts (saṅkalpas), then he is said to be established in yoga.
टीका / Commentary
योगारूढ़ वह है जो इन्द्रिय विषयों और कर्मों दोनों से अलिप्त रहता है, तथा सभी प्रकार के संकल्पों (इच्छाओं और कल्पनाओं) का त्याग कर चुका है।