ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 3
श्लोक ३ में बताया गया है कि योग के साधक के लिए कर्म और सिद्ध के लिए शांति आवश्यक है।
संस्कृत श्लोक
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३॥
ārurukṣor muner yogaṃ karma kāraṇam ucyate | yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇam ucyate ||3||
पदच्छेद / शब्दार्थ
आरुरुक्षोः: आरोहण की इच्छा रखने वाले; मुनेः: मुनि (योगी) के लिए; योगम्: योग में; कर्म: कर्म; कारणम्: साधन; उच्यते: कहा जाता है; योगारूढस्य: योग में आरूढ़ (स्थित) के लिए; तस्य: उसी; एव: ही; शमः: शम (सब क्रियाओं से उपराम); कारणम्: साधन; उच्यते: कहा जाता है।
हिंदी अनुवाद
योगारूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा जाता है और योगारूढ़ (सिद्ध) के लिए शम (सब कर्मों से उपराम हो जाना) ही साधन कहा जाता है।
English Translation
For the sage who wishes to attain yoga, action is said to be the means; for the one who is already established in yoga, tranquility (cessation of all activities) is said to be the means.
टीका / Commentary
योग के आरंभिक चरण में कर्म करना आवश्यक है, लेकिन एक बार योग में स्थित हो जाने पर सभी क्रियाओं से शांत हो जाना चाहिए। कर्म ही साधन है और शांति ही साध्य।