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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 2

अध्याय 6 · श्लोक 2

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २॥

yaṃ sannyāsam iti prāhur yogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava | na hy asaṃnyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaścana ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यम्: जिसको; संन्यासम्: संन्यास; इति: इस प्रकार; प्राहुः: कहते हैं; योगम्: योग; तम्: उसको; विद्धि: जानो; पाण्डव: हे पाण्डुपुत्र; न: नहीं; हि: निश्चय ही; असंन्यस्तसङ्कल्पः: संकल्पों का त्याग न किए हुए; योगी: योगी; भवति: होता है; कश्चन: कोई भी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पाण्डुपुत्र! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे तू योग समझ। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।

English Translation

O son of Pāṇḍu, know that to be yoga which they call renunciation. No one can become a yogi without renouncing desires.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

संन्यास और योग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं – मन की शुद्धि। संकल्प (इच्छाओं) का त्याग किए बिना योग सिद्ध नहीं होता। Renunciation of desires is essential for yoga.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।