ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में कृष्ण कहते हैं कि सच्चा योगी वही है जिसने संकल्पों का त्याग कर दिया है।
संस्कृत श्लोक
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २॥
yaṃ sannyāsam iti prāhur yogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava | na hy asaṃnyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaścana ||2||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यम्: जिसको; संन्यासम्: संन्यास; इति: इस प्रकार; प्राहुः: कहते हैं; योगम्: योग; तम्: उसको; विद्धि: जानो; पाण्डव: हे पाण्डुपुत्र; न: नहीं; हि: निश्चय ही; असंन्यस्तसङ्कल्पः: संकल्पों का त्याग न किए हुए; योगी: योगी; भवति: होता है; कश्चन: कोई भी।
हिंदी अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे तू योग समझ। क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।
English Translation
O son of Pāṇḍu, know that to be yoga which they call renunciation. No one can become a yogi without renouncing desires.
टीका / Commentary
संन्यास और योग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं – मन की शुद्धि। संकल्प (इच्छाओं) का त्याग किए बिना योग सिद्ध नहीं होता। Renunciation of desires is essential for yoga.