ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 1

श्लोक १ में भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्य करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है।

संस्कृत श्लोक

श्री भगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १॥

śrī-bhagavān uvāca | anāśritaḥ karma-phalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ | sa sannyāsī ca yogī ca na niragnir na cākriyaḥ ||1||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अनाश्रितः: बिना आश्रय लिए; कर्मफलम्: कर्म के फल का; कार्यम्: कर्तव्य; कर्म: कर्म; करोति: करता है; यः: जो; सः: वह; संन्यासी: संन्यासी; च: और; योगी: योगी; च: भी; न: नहीं; निरग्निः: अग्नि का त्याग करने वाला; न: नहीं; च: और; अक्रियः: कर्म त्याग करने वाला।

हिंदी अनुवाद

श्री भगवान् बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्यकर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, केवल अग्नि का त्याग करने वाला या क्रियाओं का त्याग करने वाला नहीं।

English Translation

The Blessed Lord said: One who performs his prescribed duty without depending on the fruit of action is a sannyāsī and a yogi, not the one who has merely renounced the fire or has given up all activity.

टीका / Commentary

भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यासी और योगी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल बाहरी क्रियाओं का त्याग करने वाला। True renunciation is inner detachment, not just external rituals.