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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 1

अध्याय 6 · श्लोक 1

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्री भगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १॥

śrī-bhagavān uvāca | anāśritaḥ karma-phalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ | sa sannyāsī ca yogī ca na niragnir na cākriyaḥ ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनाश्रितः: बिना आश्रय लिए; कर्मफलम्: कर्म के फल का; कार्यम्: कर्तव्य; कर्म: कर्म; करोति: करता है; यः: जो; सः: वह; संन्यासी: संन्यासी; च: और; योगी: योगी; च: भी; न: नहीं; निरग्निः: अग्नि का त्याग करने वाला; न: नहीं; च: और; अक्रियः: कर्म त्याग करने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्री भगवान् बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्यकर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, केवल अग्नि का त्याग करने वाला या क्रियाओं का त्याग करने वाला नहीं।

English Translation

The Blessed Lord said: One who performs his prescribed duty without depending on the fruit of action is a sannyāsī and a yogi, not the one who has merely renounced the fire or has given up all activity.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यासी और योगी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-कर्म करता है, न कि केवल बाहरी क्रियाओं का त्याग करने वाला। True renunciation is inner detachment, not just external rituals.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।