ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 45
श्लोक ४५ में अनेक जन्मों के अभ्यास से परमगति की प्राप्ति बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५॥
prayatnād yatamānas tu yogī saṃśuddha-kilbiṣaḥ | aneka-janma-saṃsiddhas tato yāti parāṃ gatim ||45||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रयत्नात्: प्रयत्नपूर्वक; यतमानः: अभ्यास करता हुआ; तु: तो; योगी: योगी; संशुद्धकिल्बिषः: पूर्णतः पापरहित; अनेकजन्मसंसिद्धः: अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध; ततः: तत्पश्चात्; याति: जाता है; पराम्: परम; गतिम्: गति को।
हिंदी अनुवाद
किन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, पूर्णतः पापरहित होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर, तत्पश्चात् परम गति को प्राप्त होता है।
English Translation
But the yogi who strives with great effort, purified of sins and perfected through many births, then attains the supreme goal.
टीका / Commentary
निरंतर अभ्यास से, क्रमशः अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, योगी परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।