ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 44
श्लोक ४४ में पूर्वाभ्यास की प्रबलता और योगजिज्ञासा का महत्व बताया गया है।
संस्कृत श्लोक
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hy avaśo 'pi saḥ | jijñāsur api yogasya śabda-brahmātivartate ||44||
पदच्छेद / शब्दार्थ
पूर्वाभ्यासेन: पूर्वाभ्यास के द्वारा; तेन: उस; एव: ही; ह्रियते: खिंच जाता है; हि: निश्चय ही; अवशः: बेबस; अपि: भी; सः: वह; जिज्ञासुः: जिज्ञासु; अपि: भी; योगस्य: योग का; शब्दब्रह्म: शब्दब्रह्म (वेदों के कर्मकाण्ड); अतिवर्तते: अतिक्रमण कर जाता है।
हिंदी अनुवाद
उसी पूर्वाभ्यास के वश से वह अनिच्छुक होते हुए भी (योग की ओर) खिंच जाता है। योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वैदिक कर्मकाण्ड) को अतिक्रमण कर जाता है।
English Translation
By the force of that previous practice alone, he is carried forward, even unwillingly. Even the inquirer into yoga goes beyond the ritualistic Brahman.
टीका / Commentary
पूर्व संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि योगी अनिच्छा से भी योग की ओर खिंचता है। योग की जिज्ञासा भी उसे कर्मकाण्डों से ऊपर उठा देती है।