ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 43

श्लोक ४३ में योगी को पूर्वजन्म के संस्कारों के मिलने का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३॥

tatra taṃ buddhi-saṃyogaṃ labhate paurva-dehikam | yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kuru-nandana ||43||

पदच्छेद / शब्दार्थ

तत्र: वहाँ; तम्: उस; बुद्धिसंयोगम्: बुद्धि के संयोग (प्राप्ति) को; लभते: प्राप्त करता है; पौर्वदेहिकम्: पूर्व शरीर का; यतते: प्रयत्न करता है; च: और; ततः: उससे; भूयः: फिर; संसिद्धौ: सिद्धि के लिए; कुरुनन्दन: हे कुरुनन्दन।

हिंदी अनुवाद

हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर की बुद्धि को (योग के संस्कार को) प्राप्त करता है और फिर सिद्धि के लिए पहले से अधिक प्रयत्न करता है।

English Translation

There, O son of the Kurus, he regains the discernment acquired in the previous body, and then strives again for perfection.

टीका / Commentary

नए जन्म में भी योगी को पूर्वाभ्यास के संस्कार मिल जाते हैं, जिससे वह पुनः प्रयत्न करता है।