ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 46
श्लोक ४६ में योगी को सबसे श्रेष्ठ बताया गया है।
संस्कृत श्लोक
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६॥
tapasvibhyo 'dhiko yogī jñānibhyo 'pi mato 'dhikaḥ | karmibhyaś cādhiko yogī tasmād yogī bhavārjuna ||46||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तपस्विभ्यः: तपस्वियों से; अधिकः: श्रेष्ठ; योगी: योगी; ज्ञानिभ्यः: ज्ञानियों से; अपि: भी; मतः: माना जाता है; अधिकः: श्रेष्ठ; कर्मिभ्यः: कर्मियों (कर्मकांडी) से; च: और; अधिकः: श्रेष्ठ; योगी: योगी; तस्मात्: इसलिए; योगी: योगी; भव: बनो; अर्जुन: हे अर्जुन।
हिंदी अनुवाद
योगी तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मयोगियों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।
English Translation
The yogi is considered superior to the ascetics, and even superior to the men of knowledge; the yogi is also superior to the men of action. Therefore, O Arjuna, become a yogi.
टीका / Commentary
भगवान् योगी की श्रेष्ठता बताते हुए अर्जुन को योगी बनने की प्रेरणा देते हैं।