ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में योगी के स्थिर चित्त की तुलना वायुरहित दीपक से की गई है।

संस्कृत श्लोक

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९॥

yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā | yogino yata-cittasya yuñjato yogam ātmanaḥ ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यथा: जैसे; दीपः: दीपक; निवातस्थः: वायुरहित स्थान में स्थित; न: नहीं; इङ्गते: चलायमान होता; सा: वह; उपमा: उपमा; स्मृता: कही गई है; योगिनः: योगी की; यतचित्तस्य: नियंत्रित चित्त वाले; युञ्जतः: योग में लगे हुए; योगम्: योग में; आत्मनः: आत्मा का।

हिंदी अनुवाद

जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं चलायमान होता, ऐसी उपमा आत्मयोग में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त के लिए कही गई है।

English Translation

As a lamp placed in a windless place does not flicker – such is the simile used for a yogi of controlled mind, absorbed in meditation on the Self.

टीका / Commentary

योगी का चित्त निवात-दीप के समान स्थिर होता है – जैसे बिना हवा के स्थान पर दीपक की लौ स्थिर रहती है।