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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 19

अध्याय 6 · श्लोक 19

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९॥

yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā | yogino yata-cittasya yuñjato yogam ātmanaḥ ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यथा: जैसे; दीपः: दीपक; निवातस्थः: वायुरहित स्थान में स्थित; न: नहीं; इङ्गते: चलायमान होता; सा: वह; उपमा: उपमा; स्मृता: कही गई है; योगिनः: योगी की; यतचित्तस्य: नियंत्रित चित्त वाले; युञ्जतः: योग में लगे हुए; योगम्: योग में; आत्मनः: आत्मा का।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं चलायमान होता, ऐसी उपमा आत्मयोग में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त के लिए कही गई है।

English Translation

As a lamp placed in a windless place does not flicker – such is the simile used for a yogi of controlled mind, absorbed in meditation on the Self.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योगी का चित्त निवात-दीप के समान स्थिर होता है – जैसे बिना हवा के स्थान पर दीपक की लौ स्थिर रहती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।