ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 18

श्लोक १८ में बताया गया है कि चित्त के आत्मा में स्थित होने पर योगी कहलाता है।

संस्कृत श्लोक

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥

yadā viniyataṃ cittam ātmany evāvatiṣṭhate | nispṛhaḥ sarva-kāmebhyo yukta ity ucyate tadā ||18||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यदा: जब; विनियतम्: अच्छी तरह नियंत्रित; चित्तम्: चित्त; आत्मनि: अपने में (स्वरूप में); एव: ही; अवतिष्ठते: स्थित हो जाता है; निःस्पृहः: निःस्पृह (स्पृहा रहित); सर्वकामेभ्यः: सब कामनाओं से; युक्तः: योगी; इति: इस प्रकार; उच्यते: कहा जाता है; तदा: तब।

हिंदी अनुवाद

जब अच्छी तरह नियंत्रित चित्त अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और सब भोगों की इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह युक्त (योगी) कहा जाता है।

English Translation

When the completely controlled mind rests steadfastly in the Self alone, free from longing for all desires, then he is said to be yukta (united with the Self).

टीका / Commentary

योगी की परिभाषा: चित्त पूरी तरह से आत्मा में स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से मुक्त हो जाता है।