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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 18

अध्याय 6 · श्लोक 18

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥

yadā viniyataṃ cittam ātmany evāvatiṣṭhate | nispṛhaḥ sarva-kāmebhyo yukta ity ucyate tadā ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यदा: जब; विनियतम्: अच्छी तरह नियंत्रित; चित्तम्: चित्त; आत्मनि: अपने में (स्वरूप में); एव: ही; अवतिष्ठते: स्थित हो जाता है; निःस्पृहः: निःस्पृह (स्पृहा रहित); सर्वकामेभ्यः: सब कामनाओं से; युक्तः: योगी; इति: इस प्रकार; उच्यते: कहा जाता है; तदा: तब।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जब अच्छी तरह नियंत्रित चित्त अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और सब भोगों की इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह युक्त (योगी) कहा जाता है।

English Translation

When the completely controlled mind rests steadfastly in the Self alone, free from longing for all desires, then he is said to be yukta (united with the Self).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योगी की परिभाषा: चित्त पूरी तरह से आत्मा में स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से मुक्त हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।