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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 17

अध्याय 6 · श्लोक 17

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥

yuktāhāra-vihārasya yukta-ceṣṭasya karmasu | yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

युक्ताहारविहारस्य: संयमित भोजन-विहार वाले; युक्तचेष्टस्य: संयमित चेष्टा (कर्म) वाले; कर्मसु: कर्मों में; युक्तस्वप्नावबोधस्य: संयमित सोने-जागने वाले; योगः: योग; भवति: होता है; दुःखहा: दुःखों का नाश करने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो भोजन-विहार में संयमी है, कर्मों में संयत है, सोने-जागने में संयमी है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।

English Translation

For one who is moderate in eating and recreation, moderate in his actions, moderate in sleep and wakefulness, yoga becomes the destroyer of sorrow.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योग की सिद्धि के लिए सभी गतिविधियों में संयम (युक्तता) आवश्यक है। ऐसा योग दुःखों का नाश करता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।