ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 17

श्लोक १७ में बताया गया है कि सभी क्रियाओं में संयम रखने से योग सिद्ध होकर दुःखों का नाश करता है।

संस्कृत श्लोक

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥

yuktāhāra-vihārasya yukta-ceṣṭasya karmasu | yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā ||17||

पदच्छेद / शब्दार्थ

युक्ताहारविहारस्य: संयमित भोजन-विहार वाले; युक्तचेष्टस्य: संयमित चेष्टा (कर्म) वाले; कर्मसु: कर्मों में; युक्तस्वप्नावबोधस्य: संयमित सोने-जागने वाले; योगः: योग; भवति: होता है; दुःखहा: दुःखों का नाश करने वाला।

हिंदी अनुवाद

जो भोजन-विहार में संयमी है, कर्मों में संयत है, सोने-जागने में संयमी है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।

English Translation

For one who is moderate in eating and recreation, moderate in his actions, moderate in sleep and wakefulness, yoga becomes the destroyer of sorrow.

टीका / Commentary

योग की सिद्धि के लिए सभी गतिविधियों में संयम (युक्तता) आवश्यक है। ऐसा योग दुःखों का नाश करता है।