ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 16
श्लोक १६ में बताया गया है कि अति किसी भी प्रकार की योग में बाधक है।
संस्कृत श्लोक
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६॥
nātyaśnatas tu yogo 'sti na caikāntam anaśnataḥ | na cāti svapna-śīlasya jāgrato naiva cārjuna ||16||
पदच्छेद / शब्दार्थ
न: नहीं; अति अश्नतः: अधिक खाने वाले का; तु: तो; योगः: योग; अस्ति: होता है; न: नहीं; च: और; एकान्तम्: सर्वदा; अनश्नतः: न खाने वाले का; न: नहीं; च: और; अति: अधिक; स्वप्नशीलस्य: सोने वाले का; जाग्रतः: जागने वाले का; न: नहीं; एव: ही; च: और; अर्जुन: हे अर्जुन।
हिंदी अनुवाद
हे अर्जुन! न तो अधिक खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न अधिक सोने वाले का और न अधिक जागने वाले का।
English Translation
O Arjuna, verily yoga is not possible for one who eats too much, nor for one who does not eat at all; nor for one who sleeps too much, nor for one who stays awake (too much).
टीका / Commentary
योग के मार्ग में संयम आवश्यक है – भोजन और नींद दोनों में अति नहीं करनी चाहिए।