ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 15

श्लोक १५ में बताया गया है कि नियमित योगाभ्यास से मिलने वाली शांति का स्वरूप।

संस्कृत श्लोक

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥

yuñjann evaṃ sadātmānaṃ yogī niyata-mānasaḥ | śāntiṃ nirvāṇa-paramāṃ mat-saṃsthām adhigacchati ||15||

पदच्छेद / शब्दार्थ

युञ्जन्: योग में लगाता हुआ; एवम्: इस प्रकार; सदा: सदा; आत्मानम्: अपने को; योगी: योगी; नियतमानसः: नियत (वश में किए) मन वाला; शान्तिम्: शान्ति; निर्वाणपरमाम्: परम निर्वाण रूप; मत्संस्थाम्: मुझमें स्थित; अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार सदा अपने मन को योग में लगाने वाला, नियत मन वाला योगी, मुझमें स्थित परम निर्वाण रूप शान्ति को प्राप्त होता है।

English Translation

Thus constantly engaging the mind in Me, the yogi of controlled mind attains the peace of Nirvana, which abides in Me.

टीका / Commentary

निरंतर अभ्यास से योगी परम शांति (निर्वाण) को प्राप्त करता है, जो भगवान में स्थित है।