ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में ध्यान के लिए आंतरिक गुणों का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४॥

praśāntātmā vigata-bhīr brahmacāri-vrate sthitaḥ | manaḥ saṃyamya mac-citto yukta āsīta mat-paraḥ ||14||

पदच्छेद / शब्दार्थ

प्रशान्तात्मा: शांत चित्त वाला; विगतभीः: भयरहित; ब्रह्मचारिव्रते: ब्रह्मचर्य व्रत में; स्थितः: स्थित; मनः: मन को; संयम्य: संयमित करके; मच्चित्तः: मुझमें चित्त लगाकर; युक्तः: योगी; आसीत: बैठे; मत्परः: मुझ परायण (मेरे परम लक्ष्य वाला)।

हिंदी अनुवाद

शान्त चित्त, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिर, मन को वश में करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझको परम लक्ष्य मानकर बैठे।

English Translation

With a serene mind, fearless, firm in the vow of celibacy, controlling the mind, with thoughts fixed on Me, he should sit, having Me as the supreme goal.

टीका / Commentary

ध्यान की आंतरिक स्थितियाँ: शांति, निर्भयता, ब्रह्मचर्य, मनोनिग्रह, और भगवत् चिन्तन।