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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 14

अध्याय 6 · श्लोक 14

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४॥

praśāntātmā vigata-bhīr brahmacāri-vrate sthitaḥ | manaḥ saṃyamya mac-citto yukta āsīta mat-paraḥ ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

प्रशान्तात्मा: शांत चित्त वाला; विगतभीः: भयरहित; ब्रह्मचारिव्रते: ब्रह्मचर्य व्रत में; स्थितः: स्थित; मनः: मन को; संयम्य: संयमित करके; मच्चित्तः: मुझमें चित्त लगाकर; युक्तः: योगी; आसीत: बैठे; मत्परः: मुझ परायण (मेरे परम लक्ष्य वाला)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

शान्त चित्त, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिर, मन को वश में करके, मुझमें चित्त लगाकर और मुझको परम लक्ष्य मानकर बैठे।

English Translation

With a serene mind, fearless, firm in the vow of celibacy, controlling the mind, with thoughts fixed on Me, he should sit, having Me as the supreme goal.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ध्यान की आंतरिक स्थितियाँ: शांति, निर्भयता, ब्रह्मचर्य, मनोनिग्रह, और भगवत् चिन्तन।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।