ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 20
श्लोक २० में योग से प्राप्त आत्मसंतुष्टि का वर्णन है।
संस्कृत श्लोक
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २०॥
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yoga-sevayā | yatra caivātmanātmānaṃ paśyann ātmani tuṣyati ||20||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यत्र: जहाँ; उपरमते: विरत हो जाता है; चित्तम्: चित्त; निरुद्धम्: निरुद्ध; योगसेवया: योग के अभ्यास से; यत्र: जहाँ; च: और; एव: ही; आत्मना: स्वयं के द्वारा; आत्मानम्: आत्मा को; पश्यन्: देखता हुआ; आत्मनि: आत्मा में; तुष्यति: संतुष्ट होता है।
हिंदी अनुवाद
जब योग के अभ्यास से निरुद्ध किया हुआ चित्त विरत हो जाता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है।
English Translation
When the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and when one sees the Self by the self and is satisfied in the Self alone.
टीका / Commentary
योग की अवस्था का वर्णन: चित्त का निरुद्ध हो जाना, और आत्म-साक्षात्कार से आत्मा में ही संतुष्ट होना।