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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 20

अध्याय 6 · श्लोक 20

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २०॥

yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yoga-sevayā | yatra caivātmanātmānaṃ paśyann ātmani tuṣyati ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्र: जहाँ; उपरमते: विरत हो जाता है; चित्तम्: चित्त; निरुद्धम्: निरुद्ध; योगसेवया: योग के अभ्यास से; यत्र: जहाँ; च: और; एव: ही; आत्मना: स्वयं के द्वारा; आत्मानम्: आत्मा को; पश्यन्: देखता हुआ; आत्मनि: आत्मा में; तुष्यति: संतुष्ट होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जब योग के अभ्यास से निरुद्ध किया हुआ चित्त विरत हो जाता है, और जब आत्मा द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है।

English Translation

When the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and when one sees the Self by the self and is satisfied in the Self alone.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योग की अवस्था का वर्णन: चित्त का निरुद्ध हो जाना, और आत्म-साक्षात्कार से आत्मा में ही संतुष्ट होना।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।