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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 4

अध्याय 5 · श्लोक 4

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४॥

sāṅkhya-yogau pṛthag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ | ekam apy āsthitaḥ samyag ubhayor vindate phalam ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सांख्ययोगौ: सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) को; पृथक्: अलग; बालाः: अज्ञानी; प्रवदन्ति: कहते हैं; न: नहीं; पण्डिताः: ज्ञानी; एकम्: एक में; अपि: भी; आस्थितः: स्थित; सम्यक्: यथार्थ रूप से; उभयोः: दोनों का; विन्दते: प्राप्त करता है; फलम्: फल।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सांख्य (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अलग-अलग केवल अज्ञानी लोग कहते हैं, पण्डित नहीं। उनमें से किसी एक में भी यथार्थ रूप से स्थित पुरुष दोनों के ही फल को प्राप्त कर लेता है।

English Translation

Children, not the wise, speak of Sankhya (knowledge) and Yoga (action) as different. He who is truly established in one obtains the fruit of both.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी जन जानते हैं कि ज्ञान और कर्म का अंतिम लक्ष्य एक ही है – परमात्मा की प्राप्ति। अतः दोनों मार्गों में विरोध नहीं है। जो एक मार्ग पर दृढ़ है, वह दोनों का फल पा लेता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।