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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 3

अध्याय 5 · श्लोक 3

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३॥

jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati | nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhāt pramucyate ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ज्ञेयः: जानना चाहिए; सः: वह; नित्यसंन्यासी: सदा संन्यासी; यः: जो; न: नहीं; द्वेष्टि: द्वेष करता है; न: नहीं; काङ्क्षति: इच्छा रखता है; निर्द्वन्द्वः: द्वन्द्वों से रहित; हि: निश्चय ही; महाबाहो: हे महाबाहो; सुखम्: सुखपूर्वक; बन्धात्: बन्धन से; प्रमुच्यते: मुक्त हो जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, वह नित्य-संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित होकर वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।

English Translation

He who neither hates nor desires is to be known as one who has ever renounced. For, O mighty-armed Arjuna, being free from dualities, he is easily released from bondage.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सच्चा संन्यासी वह नहीं जिसने बाहरी कर्म छोड़ दिए, बल्कि जिसने मन से आसक्ति और द्वेष का त्याग कर दिया है। द्वन्द्व (सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी आदि) से मुक्त व्यक्ति आसानी से मुक्त हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।