कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 3
श्लोक ३ में कृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो राग-द्वेष से रहित है।
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३॥
jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati | nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhāt pramucyate ||3||
पदच्छेद / शब्दार्थ
ज्ञेयः: जानना चाहिए; सः: वह; नित्यसंन्यासी: सदा संन्यासी; यः: जो; न: नहीं; द्वेष्टि: द्वेष करता है; न: नहीं; काङ्क्षति: इच्छा रखता है; निर्द्वन्द्वः: द्वन्द्वों से रहित; हि: निश्चय ही; महाबाहो: हे महाबाहो; सुखम्: सुखपूर्वक; बन्धात्: बन्धन से; प्रमुच्यते: मुक्त हो जाता है।
हिंदी अनुवाद
हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, वह नित्य-संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित होकर वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।
English Translation
He who neither hates nor desires is to be known as one who has ever renounced. For, O mighty-armed Arjuna, being free from dualities, he is easily released from bondage.
टीका / Commentary
सच्चा संन्यासी वह नहीं जिसने बाहरी कर्म छोड़ दिए, बल्कि जिसने मन से आसक्ति और द्वेष का त्याग कर दिया है। द्वन्द्व (सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी आदि) से मुक्त व्यक्ति आसानी से मुक्त हो जाता है।