श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 3

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 47 मिनट का पठन 156 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
ज्ञेयः
जानना चाहिए
सः
वह
नित्यसंन्यासी
सदा संन्यासी
यः
जो
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता है
न
नहीं
काङ्क्षति
इच्छा रखता है
निर्द्वन्द्वः
द्वन्द्वों से रहित
हि
निश्चय ही
महाबाहो
हे महाबाहो
सुखम्
सुखपूर्वक
बन्धात्
बन्धन से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, वह नित्य-संन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित होकर वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय (कर्मसंन्यास योग) के इस पावन श्लोक का अगाध दार्शनिक विश्लेषण एवं जीवनोपयोगी सार

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में संन्यास शब्द को लेकर अक्सर साधारण जनमानस में एक भारी भ्रम की स्थिति बनी रहती है। लोगों का ऐसा सामान्य दृष्टिकोण होता है कि घर-परिवार, समाज, और भौतिक दायित्वों को छोड़कर वनों या गुफाओं में चले जाना, भगवा वस्त्र धारण करना तथा सांसारिक सुखों से पूर्णतः विमुख हो जाना ही वास्तविक संन्यास है। किंतु, श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य और शाश्वत ज्ञान के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्राचीन संकल्पना को एक अत्यंत क्रांतिकारी, व्यावहारिक और उच्च आध्यात्मिक आयाम प्रदान किया है। प्रस्तुत श्लोक—"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति..."—मानव चेतना को यह सिखाता है कि संन्यास केवल बाह्य परिवेश या वेशभूषा का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण की एक ऐसी पवित्र अवस्था है जहाँ मनुष्य का मन राग और द्वेष के द्वंद्वों से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है।

जब हम इस श्लोक की ब्रह्मांडीय और तात्विक गहराई में उतरते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि संसार में रहते हुए भी संन्यासी जीवन कैसे जिया जा सकता है। सांसारिक जीवन की भागदौड़, पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन और व्यावसायिक संघर्षों के बीच भी यदि मनुष्य का आंतरिक मानस अप्रभावित रहता है, तो वही सच्चा योगी और संन्यासी कहलाता है। इस श्लोक का सांस्कृतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह किसी भी व्यक्ति को उसके सामाजिक कर्तव्यों से विमुख किए बिना, भीतर से मुक्त होने का राजमार्ग दिखाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र के विकट रणक्षेत्र में यह उपदेश देते हैं, जो इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि परम सत्य की प्राप्ति के लिए पलायन की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि रणक्षेत्र जैसे कठिन हालातों में भी स्थितप्रज्ञ बने रहने की साधना ही असली धर्म है।

इस आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य तनाव, अवसाद, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और इच्छाओं के मकड़जाल में उलझा हुआ है, यह श्लोक एक अचूक औषधि की भांति कार्य करता है। जब व्यक्ति किसी वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति से न तो अत्यधिक द्वेष करता है और न ही किसी चीज की अत्यधिक आकांक्षा या लालसा रखता है, तब उसका चित्त निर्मल जल की भांति शांत हो जाता है। यही वह मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति है जो जीव को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर परमानंद की प्राप्ति कराती है। Bhaktilok.in के माध्यम से हमारा उद्देश्य पाठकों को इसी सनातन चेतना से जोड़ना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में गीता के इन शाश्वत सत्यों को आत्मसात कर सकें और मानसिक शांति के साथ-साथ आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — पंचम अध्याय (कर्मसंन्यास योग), श्लोक संख्या ३

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ ३॥

श्लोक का सरल भावार्थ:

हे महाबाहु अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा (इच्छा) करता है, उसे तू सदा संन्यासी ही समझ। क्योंकि वह राग-द्वेष आदि समस्त द्वंद्वों से पूरी तरह मुक्त होकर संसार के बंधनों से सहज ही सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के एक-एक शब्द में वेदों का सार छिपा है। आइए इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ज्ञेयः जानना चाहिए / माननीय यह आदेशात्मक पद है जो साधਕ को यह निर्देश देता है कि उसे भ्रामक बाह्य लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिति के आधार पर वास्तविक संन्यासी को पहचानना चाहिए।
सः वह (पुरुष) यह विशेष रूप से उस आदर्श मनुष्य की ओर संकेत करता है जिसने अपनी चेतना को भौतिक स्तर से उठाकर आध्यात्मिक स्तर पर स्थापित कर लिया है।
नित्यसंन्यासी सदा रहने वाला संन्यासी / वास्तविक संन्यासी इसका अर्थ केवल कुछ समय के लिए वैराग्य धारण करना नहीं है, बल्कि निरंतर, शाश्वत रूप से आसक्तिरहित जीवन जीने की मानसिक अवस्था है।
यः जो (व्यक्ति) यह पात्रता को रेखांकित करता है; यानी यह पद हर उस जीव के लिए खुला है जो इस साधना मार्ग को अपने जीवन में उतारने का साहस करता है।
न द्वेष्टि न द्वेष करता है अप्रिय परिस्थितियों, अपमान, दुःख या प्रतिकूल व्यक्तियों के मिलने पर भी मन में दुर्भावना, क्रोध या प्रतिकार की भावना का उत्पन्न न होना।
न काङ्क्षति न आकांक्षा करता है / इच्छा नहीं करता अनुकूल परिस्थितियों, सुख, धन, यश या भविष्य की सुख-सुविधाओं के प्रति लालसा या तृष्णा का पूर्ण अभाव, जो मानसिक शांति की मूल शर्त है।
निर्द्वन्द्वः द्वंद्वों से मुक्त सुख-दुःख, मान-अपमान, शीत-उष्ण (सर्दी-गर्मी), और लाभ-हानि जैसे प्रकृति के विपरीत जोड़ों से जो मनुष्य पूरी तरह तटस्थ और अप्रभावित रहता है।
हि निश्चय ही / क्योंकि यह एक अकाट्य और सार्वभौमिक सत्य को स्थापित करता है, जिसमें किसी भी प्रकार के संशय या अपवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती है।
महाबाहो हे महाबाहु (अर्जुन को संबोधन) बलवानों में श्रेष्ठ अर्जुन को यह कहकर संबोधित किया गया है कि वास्तविक पराक्रम केवल युद्ध जीतना नहीं, बल्कि अपने मन के विकारों को जीतना है।
सुखम् बन्धात् सुखपूर्वक बंधनों से कर्मों के कठिन पाश और पुनर्जन्म के चक्र से बिना किसी कष्टदायक हठयोग के, केवल मानसिक समझ और शुद्धि के बल पर सहज मुक्ति।
प्रमुच्यते पूरी तरह छूट जाता है / मुक्त होता है अविद्या (अज्ञान) की गांठ हमेशा के लिए खुल जाती है और आत्मा अपनी मूल सच्चिदानंद स्वरूप स्थिति में लीन हो जाती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का आरंभ ही अर्जुन के एक बहुत ही स्वाभाविक और उलझन भरे प्रश्न से होता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप और उपदेशों को सुनने के बाद अर्जुन के मन में एक वैचारिक द्वंद्व उत्पन्न हो जाता है। चतुर्थ अध्याय के अंत तक भगवान ने ज्ञान और कर्म दोनों का मार्ग समझाया था। अर्जुन असमंजस में पड़ जाते हैं कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो वे कृष्ण से युद्ध रूपी घोर कर्म क्यों करवा रहे हैं? इसी दुविधा के समाधान के लिए पंचम अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन पूछते हैं— "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्ब्रूहि सुनिश्चितम्॥" (हे कृष्ण! आप कभी कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कभी कर्मयोग की। इनमें से जो एक निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।)

अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत अद्भुत और गांभीर्य से भरे शब्दों में स्पष्ट किया कि संन्यास और कर्मयोग दोनों ही परम कल्याण को प्राप्त कराने वाले मार्ग हैं, किंतु इनमें से कर्मयोग बाह्य त्याग की अपेक्षा अधिक सुगम और श्रेष्ठ है। इसी संदर्भ को विस्तार देते हुए भगवान ने तीसरे श्लोक में उस महान दार्शनिक सिद्धांत की स्थापना की जिसे आज हम इस आलेख के माध्यम से समझ रहे हैं। भगवान ने समझाया कि अज्ञानी लोग सांख्य योग (ज्ञान मार्ग) और कर्मयोग को अलग-अलग मानते हैं, जबकि पंडितजन दोनों को एक ही रूप में देखते हैं। जो व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करते हुए अपने भीतर राग और द्वेष को त्याग देता है, उसे अलग से जंगल में जाकर संन्यासी बनने की कोई आवश्यकता नहीं रहती।

महाभारत के अनुशासन पर्व और विभिन्न पुराणों में भी इस प्रसंग के गहरे अर्थों पर ऋषियों और मुनियों के बीच लंबी चर्चाएं मिलती हैं। महर्षि व्यास ने महाभारत में कई स्थानों पर राजा जनक, विदुर और भीष्म पितामह जैसे महापुरुषों का उदाहरण दिया है जो राजमहलों और राज्यसत्ता के बीच रहकर भी परम संन्यासी की भांति जीवन जीते थे। राजा जनक का उदाहरण सनातन संस्कृति में सर्वविदित है, जिन्हें 'विदेह' (शरीर और संसार से मुक्त) कहा गया है। उनके महलों में सब कुछ होते हुए भी उनका मन कभी उन वस्तुओं से आबद्ध नहीं हुआ। इसी ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह विश्वास दिलाते हैं कि कर्तव्य कर्म करते हुए भी आंतरिक शुद्धि के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इन पावन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और इनके गूढ़ अर्थों को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और संताप से मुक्ति

जब व्यक्ति किसी से द्वेष नहीं करता और न ही किसी चीज की अत्यधिक आकांक्षा रखता है, तो उसका मन अनावश्यक चिंताओं और मानसिक तनावों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, जिससे अगाध शांति की अनुभूति होती है.

2. सकारात्मक और संतुलित ऊर्जा का प्रवाह (Aura)

इस श्लोक के भावों को आचरण में ढालने से शरीर और मन के चारों ओर एक सकारात्मक आध्यात्मिक और ऊर्जस्वी आवरण (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं को स्वतः दूर कर देता है.

3. कर्म बंधनों से शुद्धि और मुक्ति

आसक्ति और फल की इच्छा के बिना कर्म करने की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिससे नए कर्मों के बंधन (Karma Phala) कमजोर होते हैं और पुराने संचित कर्मों का क्षय होना प्रारंभ हो जाता है.

4. विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिरता

सुख-दुःख, लाभ-हानि या जय-पराजय रूपी द्वंद्वों में मनुष्य विचलित नहीं होता। वह जल में कमल के पत्ते की भांति संसार के बीच रहकर भी उससे अलिप्त और तटस्थ रहना सीख जाता है.

5. Divine Grace (ईश्वरीय कृपा) की प्राप्ति

जब साधक का अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और लालच समाप्त हो जाता है, तो उसका अंतःकरण भगवान के वास के योग्य निर्मल हो जाता है, जिससे सहज ही भगवत्कृपा और दिव्य चेतना की प्राप्ति होती है.

6. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता (विवेक बुद्धि)

राग और द्वेष ही मनुष्य की बुद्धि को मलिन और भ्रमित करते हैं। जब ये विकार शांत हो जाते हैं, तो साधक की विवेक बुद्धि जाग्रत होती है और वह जीवन के हर मोड़ पर सही और न्यायसंगत निर्णय ले पाता है.

7. भय और असुरक्षा की भावना का नाश

अधिकांश भय भविष्य की अनिश्चितता या प्रिय वस्तुओं के खोने की आशंका से पैदा होते हैं। जब आकांक्षा ही नहीं रहती, तो भय का कोई अस्तित्व नहीं बचता, और साधक निर्भीक व आनंदित रहता है.

8. उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का मार्ग

आयुर्वेद और योग विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मानसिक द्वेष, ईर्ष्या और अकारण महत्वाकांक्षाएं शरीर में कई मनोदैहिक (Psychosomatic) रोगों को जन्म देती हैं। मन के शांत होने से शारीरिक स्वास्थ्य स्वतः सुधरता है.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note & EEAT)

Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता महापुराणान्तर्गत भीष्म पर्व) तथा आदिशंकराचार्य, स्वामी रामानुज एवं स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों की भाष्यों और टीकाओं के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्रियां पहुंचाई जाएं, वे पूरी तरह शास्त्रसम्मत, प्रामाणिक, गरिमामयी और तथ्यात्मक रूप से शुद्ध हों। हम आधुनिक जीवनशैली की व्यस्तताओं के बीच प्राचीन वैदिक ज्ञान को अत्यंत सरल, सुबोध और व्यावहारिक हिंदी भाषा में प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि हर सनातन प्रेमी अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बना सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के अनुसार वास्तविक संन्यास बाह्य वेशभूषा या घर छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन की एक अवस्था है। यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार और समाज में रहते हुए अपने सभी कर्तव्यों का पालन करता है, किंतु उसके मन में किसी के प्रति राग, द्वेष, ईर्ष्या या वस्तुओं के प्रति अत्यधिक लालसा नहीं होती, तो भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि में वही व्यक्ति 'नित्य संन्यासी' (सच्चा संन्यासी) है।

दैनिक जीवन में इस उपदेश का पालन करने का अर्थ है कि हमें अपने सहकर्मियों, पड़ोसियों या परिजनों के साथ मतभेद होने पर भी उनसे द्वेष (नफरत) नहीं पालना चाहिए। इसी प्रकार, भविष्य को लेकर अत्यधिक लालच या हर समय कुछ पाने की जिद्द (आकांक्षा) को छोड़कर वर्तमान में अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इससे जीवन का अधिकांश मानसिक तनाव तुरंत समाप्त हो जाता है।

'निर्द्वन्द्व' का अर्थ है प्रकृति के सभी द्वंद्वों—जैसे सुख और दुःख, सर्दी और गर्मी, मान और अपमान, लाभ और हानि—से ऊपर उठ जाना। जब मनुष्य इन विपरीत परिस्थितियों से प्रभावित होना बंद कर देता है और हर स्थिति में अपने मन को शांत रखता है, तब वह संसार के बंधनों (कर्म फल और पुनर्जन्म के चक्र) से सहज ही मुक्त हो जाता है।

वैदिक दर्शन में सामान्य जीविका या कर्तव्य पालन के लिए की जाने वाली योजनाएं गलत नहीं हैं, किंतु यहाँ 'काङ्क्षति' शब्द उस तीव्र, आसक्तिपूर्ण तृष्णा या लालसा के लिए प्रयुक्त हुआ है जो मनुष्य को बेचैन कर देती है और जिसके पूरा न होने पर वह दुखी या क्रोधी हो जाता है। आत्मिक शांति के लिए इस प्रकार की स्वार्थी आकांक्षाओं का त्याग आवश्यक है।

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का मुख्य विषय 'कर्मसंन्यास योग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि ज्ञान योग (सांख्य) और कर्म योग—दोनों का गंतव्य एक ही है, किंतु कर्मों का त्याग करने की अपेक्षा आसक्ति छोड़कर कर्म करना (कर्मयोग) अधिक सुगम, व्यावहारिक और श्रेष्ठ है।

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॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

बाहरी त्याग से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक त्याग। जो न तो किसी से द्वेष करता है और न ही किसी चीज़ की लालसा, वही सच्चा संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति द्वन्द्वों से ऊपर उठकर सहज ही मुक्त हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 3/29 10% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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