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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 2

अध्याय 5 · श्लोक 2

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥

śrī-bhagavān uvāca sannyāsaḥ karma-yogaś ca niḥśreyasa-karāv ubhau | tayos tu karma-sannyāsāt karma-yogo viśiṣyate ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; संन्यासः: संन्यास (कर्मों का त्याग); कर्मयोगः: कर्मयोग; च: और; निःश्रेयसकरौ: मोक्ष के साधक; उभौ: दोनों; तयोः: उन दोनों में; तु: परन्तु; कर्मसंन्यासात्: कर्म-संन्यास से; कर्मयोगः: कर्मयोग; विशिष्यते: श्रेष्ठ है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: संन्यास और कर्मयोग – ये दोनों ही मोक्ष के साधक हैं। परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास (कर्मों के त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।

English Translation

The Blessed Lord said: Renunciation (sannyasa) and karma-yoga (selfless action) both lead to the supreme goal. But between the two, karma-yoga is superior to renunciation of action.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् स्पष्ट करते हैं कि हालाँकि दोनों मार्ग मोक्ष देने वाले हैं, फिर भी सक्रिय रहते हुए फलासक्ति रहित कर्म करना (कर्मयोग) केवल कर्मों को त्याग देने से बेहतर है, क्योंकि त्याग सबके लिए सम्भव नहीं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।