कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में कृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग, कर्म-संन्यास से श्रेष्ठ है।
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥
śrī-bhagavān uvāca sannyāsaḥ karma-yogaś ca niḥśreyasa-karāv ubhau | tayos tu karma-sannyāsāt karma-yogo viśiṣyate ||2||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; संन्यासः: संन्यास (कर्मों का त्याग); कर्मयोगः: कर्मयोग; च: और; निःश्रेयसकरौ: मोक्ष के साधक; उभौ: दोनों; तयोः: उन दोनों में; तु: परन्तु; कर्मसंन्यासात्: कर्म-संन्यास से; कर्मयोगः: कर्मयोग; विशिष्यते: श्रेष्ठ है।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: संन्यास और कर्मयोग – ये दोनों ही मोक्ष के साधक हैं। परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास (कर्मों के त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।
English Translation
The Blessed Lord said: Renunciation (sannyasa) and karma-yoga (selfless action) both lead to the supreme goal. But between the two, karma-yoga is superior to renunciation of action.
टीका / Commentary
भगवान् स्पष्ट करते हैं कि हालाँकि दोनों मार्ग मोक्ष देने वाले हैं, फिर भी सक्रिय रहते हुए फलासक्ति रहित कर्म करना (कर्मयोग) केवल कर्मों को त्याग देने से बेहतर है, क्योंकि त्याग सबके लिए सम्भव नहीं।