श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 2

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 40 मिनट का पठन 153 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
श्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
संन्यासः
संन्यास (कर्मों का त्याग)
कर्मयोगः
कर्मयोग
च
और
निःश्रेयसकरौ
मोक्ष के साधक
उभौ
दोनों
तयोः
उन दोनों में
तु
परन्तु
कर्मसंन्यासात्
कर्म-संन्यास से
कर्मयोगः
कर्मयोग
विशिष्यते
श्रेष्ठ है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: संन्यास और कर्मयोग – ये दोनों ही मोक्ष के साधक हैं। परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास (कर्मों के त्याग) की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय ५, श्लोक २: कर्म और संन्यास का सनातन दर्शन

सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च मुकुटमणि के समान है। यह केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में दो सेनाओं के बीच हुआ संवाद मात्र नहीं है, बल्कि यह मानवमात्र की अंतरात्मा और परमात्मा के बीच का शाश्वत संवाद है। श्रीमद्भागवतगीता के पांचवें अध्याय, जिसे 'कर्मसंन्यास योग' कहा जाता है, के इस द्वितीय श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत गूढ़, व्यावहारिक और जीवनोपयोगी दार्शनिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। मानव जीवन का परम लक्ष्य क्या है? क्या संसार के सारे बंधनों को छोड़कर वनों या गुफाओं में चले जाना ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है? या फिर इस भौतिक संसार में रहते हुए, अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए भी परम शांति और मुक्ति को प्राप्त किया जा सकता है? इन समस्त जटिल और शाश्वत जिज्ञासाओं का अत्यंत स्पष्ट, तार्किक और प्रेरणादायक उत्तर इस श्लोक में निहित है।

भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से उद्घोषित करते हैं कि संन्यास (कर्मों का भौतिक त्याग) और कर्मयोग (कर्तव्य कर्मों का फलासक्ति रहित अनुष्ठान)—ये दोनों ही मार्ग मनुष्य को परम कल्याण (निःश्रेयस) की ओर ले जाने में समर्थ हैं। तथापि, जब इन दोनों की तुलना की जाती है, तो भगवान इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शुष्क संन्यास की अपेक्षा 'कर्मयोग' श्रेष्ठ और अधिक सुगम है। इसका मुख्य कारण यह है कि केवल भौतिक रूप से कर्मों का त्याग कर देना आसान नहीं है, और यदि त्याग कर भी दिया जाए, तो बिना आंतरिक शुद्धि के मन वासनाओं से मुक्त नहीं हो सकता। इसके विपरीत, कर्मयोग मनुष्य को उसके दैनिक जीवन के कर्तव्यों से जोड़े रखते हुए भी अनासक्त होना सिखाता है, जो कि अंतःकरण की शुद्धि और त्वरित आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है। भक्तिलok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी श्लोक के हर एक पक्ष का गहन शास्त्रीय, व्याकरणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक

श्रीभगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥


श्लोकानुवाद (पदच्छेद सहित):
श्रीभगवान् उवाच: संन्यासः (च) कर्मयोगः च निःश्रेयसकरौ उभौ । तयोः तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगः विशिष्यते ॥

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक संस्कृत पद का व्याकरणिक अर्थ और उसका आंतरिक दार्शनिक मर्म निम्नलिखित सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रीभगवानुवाच श्री भगवान ने कहा परमेश्वर, जो ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन छह गुणों से युक्त हैं, उनका जीवों के कल्याण हेतु निष्कपट उपदेश।
संन्यासः कर्मों का पूर्ण त्याग समस्त विहित कर्मों और उनके फलों का भौतिक त्याग, जिसमें संन्यासी समाज से दूर रहकर केवल ब्रह्मचिंतन करता है।
कर्मयोगश्च और कर्मयोग आसक्ति और फल की कामना को छोड़कर, ईश्वरार्पण बुद्धि से अपने नियत कर्तव्यों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करना।
निःश्रेयसकरौ मोक्ष / परम कल्याण देने वाले दोनों ही मार्ग मनुष्य को भवसागर से पार उतारकर परम पद या मोक्ष की प्राप्ति कराने में समान रूप से सक्षम हैं।
उभौ ये दोनों ही यहाँ किसी एक मार्ग को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया, अपितु दोनों की सार्थकता को स्वीकार किया गया है।
तयोः तु परन्तु उन दोनों में से भी दोनों की मोक्षदायिनी शक्ति स्वीकार करने के बाद दोनों के व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक धरातल पर तुलना करना।
कर्मसंन्यासात् केवल कर्मों के भौतिक त्याग से अन्तरंग शुद्धि के बिना केवल बाह्य रूप से वस्त्र बदलकर कर्मों का त्याग करना जो कि कठिन और जोखिम भरा है।
कर्मयोगः कर्मयोग (निःस्वार्थ कर्म) संसार में रहते हुए, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों को निभाते हुए भगवान में मन लगाए रखना।
विशिष्यते विशेष है / श्रेष्ठ है सामान्य मनुष्य के लिए अधिक सुगम, सुरक्षित और आध्यात्मिक प्रगति में तीव्र गति प्रदान करने वाला सिद्ध होता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के पंचम अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में घटित होता है। अर्जुन, जो कि मोहग्रस्त होकर अपने ही गुरुओं, सगे-सम्बन्धियों और मित्रों को युद्धभूमि में देखकर विषाद से भर जाते हैं, वे भगवान श्रीकृष्ण से बार-बार परस्पर विरोधी लगने वाले प्रश्नों पूछते हैं। चौथे अध्याय के अंत और पाँचवें अध्याय के आरंभ में अर्जुन के मन में एक मुख्य संशय यह था कि एक ओर भगवान ज्ञान और संन्यास की महिमा गाते हैं, तो दूसरी ओर उन्हें भयानक युद्ध करने के लिए भी प्रेरित करते हैं। अर्जुन का यह असमंजस प्राचीन काल से ही मुनियों और विचारकों के बीच चर्चा का विषय रहा है कि क्या मोक्ष प्राप्ति के लिए संसार को छोड़ना अनिवार्य है?

वैदिक और उपनिषदिक काल से ही संन्यास मार्ग (निवृत्ति मार्ग) और गृहस्थ या कर्म मार्ग (प्रवृत्ति मार्ग) के बीच बौद्धिक मंथन चलता रहा है। प्राचीन वेदों में यज्ञ, हवन और सामाजिक कर्तव्यों (प्रवृत्ति) को प्रधानता दी गई, जबकि बाद के उपनिषदों में आत्मज्ञान और वनवास (निवृत्ति) पर बल दिया गया। इस अंतर्विरोध को समाप्त करने के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के उस पवित्र प्रांगण में अर्जुन को यह अनुपम दृष्टि दी। भगवान ने समझाया कि संन्यास का अर्थ केवल वस्त्र त्यागना नहीं है, बल्कि आंतरिक इच्छाओं और अहंकार का त्याग है। जो मनुष्य अपनी इच्छाओं का दमन किए बिना केवल कर्म छोड़ देता है, वह ढोंगी (मिथ्याचारी) बन जाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने घर-परिवार, राज्य और समाज के दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी फल की इच्छा नहीं रखता, वह सच्चा संन्यासी और श्रेष्ठ कर्मयोगी है। इस प्रकार, यह श्लोक वेदों के कर्मकांड और उपनिषदों के ज्ञानकांड का एक अद्भुत और व्यावहारिक समन्वय प्रस्तुत करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक के नियमित स्मरण, पठन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

फल की चिंता से मुक्त होकर कर्म करने से मस्तिष्क का तनाव समाप्त होता है और गहरी मानसिक शांति का अनुभव होता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के पावन शब्दों का उच्चारण और उनके अर्थ का चिंतन करने से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का विकास होता है।

3. कर्म बंधनों से मुक्ति

अनासक्त भाव से किए गए कर्मों का कोई नकारात्मक कर्मफल (कार्मिक बैगेज) नहीं बनता, जिससे आत्मा धीरे-धीरे बंधनों से मुक्त होने लगती है।

4. अंतःकरण की शुद्धि

कर्तव्य पालन के दौरान अहंकार और स्वार्थ का शमन होता है, जिससे चित्त शुद्ध होता है और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति जाग्रत होती है।

5. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

द्वैत और संशय दूर होने से जीवन के कठिन मोर्चों पर सही, न्यायसंगत और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है।

6. भगवत्कृपा की प्राप्ति

जो साधক संसार में रहकर अपने सभी कार्यों को भगवान को समर्पित करता है, वह शीघ्र ही भगवान की अहैतु का कृपा पात्र बन जाता है।

7. कर्तव्यपरायणता और उत्तरदायित्व बोध

व्यक्ति अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से भागने के बजाय उन्हें पूरी निष्ठा और आनंद के साथ निभाता है।

8. भय और शोक का नाश

सफलता और असफलता से ऊपर उठ जाने के कारण जीवन में किसी भी प्रकार का भय, चिंता या विषाद टिक नहीं पाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भागवतगीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के परिप्रेक्ष्य में) तथा सनातन धर्म के अन्य मूल ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक सामग्री पहुँचे, वह पूरी तरह से प्रामाणिक, शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल और तार्किक हो। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस बात विशेष ध्यान रखा गया है कि किसी भी प्रकार के संप्रदाय विशेष के पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर गीता के सार्वभौमिक संदेश को जन-जन तक पहुँचाया जाए। हमारे संस्कृत भाषाविदों और वेदान्त आचार्यों ने प्रत्येक श्लोक के शब्दों की व्युत्पत्ति और उनके दार्शनिक निहितार्थों का सूक्ष्म परीक्षण किया है, ताकि आज की आधुनिक पीढ़ी भी सनातन संस्कृति के इस अमूल्य खजाने से पूरी तरह लाभान्वित हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

संन्यास में मनुष्य समाज और समस्त विहित कर्मों का भौतिक रूप से त्याग करके एकांत में साधना करता है, जबकि कर्मयोग में मनुष्य अपने परिवार, व्यवसाय और सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए मन से फल की आसक्ति और अहंकार का त्याग करता है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार दोनों ही मोक्षदायक हैं, किंतु कर्मयोग अधिक व्यावहारिक और श्रेष्ठ है।

निश्चित रूप से! बल्कि आज के इस तनावपूर्ण और व्यस्त जीवन में कर्मयोग ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो मानसिक शांति दे सकता है। नौकरी, व्यापार या पारिवारिक जीवन जीते हुए भी यदि हम अपने कार्यों को पूरी ईमानदारी से करें और परिणाम (जैसे मुनाफा, पदोन्नति या प्रशंसा) की चिंता में खुद को न खोएं, तो यही आधुनिक कर्मयोग है।

भौतिक रूप से कर्मों का त्याग कर देना (संन्यास) बहुत कठिन है और यदि अंतःकरण की शुद्धि न हो तो मन में वासनाएं बनी रहती हैं। इसके विपरीत, कर्मयोग मनुष्य को स्वाभाविक रूप से उसके कर्तव्यों से जोड़कर धीरे-धीरे उसकी आसक्ति समाप्त करता है, जो कि मानसिक पतन के जोखिम के बिना आत्मशुद्धि का सबसे सुरक्षित मार्ग है।

पांचवें अध्याय का मुख्य शीर्षक 'कर्मसंन्यास योग' है। इसमें कर्मयोग और सांख्य योग (ज्ञानयोग) के समन्वय पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसमें यह समझाया गया है कि ज्ञान और कर्म दो अलग मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक ही परम सत्य प्राप्ति की दो सीढ़ियां हैं, और अनासक्त भाव से कर्म करना ही सबसे उत्तम मार्ग है।

हाँ, शत-प्रतिशत। जब कोई साधक निष्काम भाव से अपने सभी कर्म ईश्वर को समर्पित करते हुए करता है, तो उसके चित्त के सारे मैल धुल जाते हैं। अंतःकरण शुद्ध होने पर ज्ञान का प्रकाश स्वतः होता है और वह जीव जीवनमुक्त होकर अंततः परम ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि दोनों मार्ग मोक्षदायी हैं, लेकिन कर्मयोग को विशेष रूप से श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि यह सबके लिए साध्य है। Karma yoga is easier and more practical for most people, as it channels natural human activity toward spiritual growth.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 2 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 2/29 7% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!