श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 1

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 41 मिनट का पठन 175 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
संन्यासम्
त्याग
कर्मणाम्
कर्मों का
कृष्ण
हे कृष्ण
पुनः
फिर
योगम्
(कर्म)योग
च
और
शंससि
आप प्रशंसा करते हैं
यत्
जो
श्रेय
कल्याणकारी
एतयोः
इन दोनों में से
एकम्
एक
तत्
वह
मे
मुझे
ब्रूहि
कहिए
सुनिश्चितम्
निश्चयपूर्वक।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की भी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता पाँचवाँ अध्याय: संन्यासकर्मयोग - अर्जुन का संशय और समाधान

"अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥"


1. व्यापक आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय प्रासंगिकता

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन के सर्वोच्च शिखर ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय के इस प्रथम श्लोक में अर्जुन की मनोस्थिति एक सच्चे जिज्ञासु की उस परम अवस्था को दर्शाती है, जहाँ द्वैत और संशय समाप्त होकर स्पष्ट ज्ञान प्राप्ति की तीव्र लालसा जन्म लेती है। कुरुक्षेत्र के मैदान में, जहाँ एक ओर शंखों और महानादों का गगनभेदी कोलाहल गूँज रहा है, वहीं दूसरी ओर अर्जुन का अंतःकरण असीम आकुलता और आंतरिक मंथन से गुजर रहा है। पिछले चतुर्थ अध्याय (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) के अंत तक भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान के मार्ग (सांख्य योग) और निष्काम कर्म के मार्ग (कर्म योग)—दोनों का ही अत्यंत सूक्ष्मता से विस्तार किया था। इन दोनों ही मार्गों की महिमा सुनकर अर्जुन के मन में एक गहरा बौद्धिक और व्यावहारिक भ्रम उत्पन्न हो जाता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक मानव जीवन के उस सनातन प्रश्न को उजागर करता है जो हर युग के साधक को मथता रहा है—क्या मुक्ति के लिए संसार त्याग कर संन्यासी बनना अनिवार्य है, या फिर घर-परिवार और समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी परमात्मा को पाया जा सकता है? अर्जुन का यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति की दुविधा नहीं है, बल्कि यह समस्त मानवता की उस आंतरिक जिज्ञासा का प्रतीक है जो भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन खोजना चाहती है। श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाते हैं कि धर्ममार्ग में कोई भी जिज्ञासा अनुचित नहीं होती, बशर्ते वह अहंकार से नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण की सच्ची भावना से उत्पन्न हो।

ब्रह्मांडीय परिप्रेक्ष्य में, यह श्लोक जीव और ईश्वर के उस शाश्वत संवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ कर्म की अनिवार्यता और संन्यास के आंतरिक स्वरूप पर विचार किया जाता है। ब्रह्मांड का प्रत्येक घटक—चाहे वह सूर्य का तपना हो, वायु का बहना हो, या ग्रहों की गति हो—एक अनुशासन और नियत कर्म के अधीन है। ऐसे में मनुष्य के लिए कर्म का त्याग कैसे संभव हो सकता है? अर्जुन की यह व्याकुलता हमें इस सत्य से अवगत कराती है कि बिना तत्वों को गहराई से समझे, केवल सतही ज्ञान के आधार पर जीवन के निर्णय लेना असंभव है। यह मार्गदर्शक श्लोक हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन के जटिल संशयों को छिपाएँ नहीं, बल्कि योग्य गुरु या ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत कर परम सत्य का संधान करें।

2. संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

भक्ति और श्रद्धा के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के इस पवित्र श्लोक का उच्चारण करने से साधक की मानसिक वृत्तियां शांत होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है। नित्य पाठ के समय आसन पर बैठकर पवित्र मन से इस श्लोक का सस्वर पाठ करना चाहिए।

अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥

संधी विच्छेद: संन्यासं कर्मणाम् कृष्ण पुनः योगम् च शंससि । यत् श्रेयः एतयोः एकम् तत् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥

पाठ विधि एवं नियम:
  • प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण या गीता ग्रंथ के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें।
  • श्लोक का उच्चारण स्पष्ट और निर्धारित स्वर लय के साथ कम से कम तीन या ग्यारह बार करें।
  • पाठ के पश्चात भगवान से प्रार्थना करें कि वे आपके जीवन के सभी संशयों का निवारण करें।

3. पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अगाध दार्शनिक गहराई छिपी है। आइए, संस्कृत व्याकरण और आचार्यों के वचनों के आधार पर इसका सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अर्जुन उवाच अर्जुन बोले जिज्ञासु जीव का प्रतीक, जो अज्ञान के अंधकार से निकलकर प्रकाश की ओर जाने के लिए प्रश्न कर रहा है।
संन्यासं संन्यास को (कर्मों का त्याग) संसारिक वासनाओं, आसक्तियों और कर्मों के फलों से पूरी तरह विरक्त होने की मानसिक और बाहरी स्थिति।
कर्मणां समस्त कर्मों का मन, वाणी और शरीर द्वारा किए जाने वाले दैनिक, विहित और भौतिक क्रियाकलाप।
कृष्ण हे कृष्ण! (यदुवंशी, सबके आकर्षण केंद्र) समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, सर्वज्ञ और अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण, जो सभी दुखों का निवारण करने में समर्थ हैं।
पुनः फिर से / दोबारा यह दर्शाता है कि भगवान ने पहले भी इन विषयों पर प्रकाश डाला था, जिससे अर्जुन के मन में विकल्प पैदा हुए।
योगं च और कर्मयोग को आसक्ति छोड़कर कुशलतापूर्वक कर्तव्य कर्म करने की पद्धति, जो ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग है।
शंससि आप प्रशंसा करते हैं / कहते हैं भगवान द्वारा दोनों ही मार्गों (संन्यास और कर्मयोग) को श्रेष्ठ बताने की स्थिति का वर्णन।
यत् जो (इन दोनों में से) एक निश्चित और अचूक विकल्प चुनने के लिए अर्जुन की ललक।
श्रेयः कल्याणकारी / श्रेष्ठ वह मार्ग जो आत्मा को मोक्ष और आत्यंतिक शांति की ओर ले जाए।
एतयोः इन दोनों में से ज्ञान/संन्यास और निष्काम कर्मयोग—इन दोनों परस्पर पूरक प्रतीत होने वाले मार्गों में से।
एकम् कोई एक (अद्वितीय मार्ग) साधक की क्षमता के अनुकूल एकमात्र सीधा और स्पष्ट निर्देश।
तत् मे वह मुझको दीनभाव से शरणागत होकर शिष्य द्वारा गुरु से याचना करना।
ब्रूहि कहिए / समझाइए ज्ञान के दान के लिए गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और विनय।
सुनिश्चितम् भली-भांति निश्चित करके / अंतिम निर्णय के रूप में ऐसा निर्णय जिसमें कोई संदेह या दुविधा की गुंजाइश न बचे।

4. धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इतिहास का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है, जहाँ कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। युद्ध के प्रारंभ होने से ठीक पूर्व, अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को देखकर गंभीर मानसिक विषाद से घिर जाते हैं। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगता है और उनका मन भ्रमित हो जाता है। तब जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन और कर्तव्य के वास्तविक अर्थ को समझाने के लिए उपदेश देना आरंभ करते हैं। गीता के शुरुआती अध्यायों में भगवान ने आत्मा की अमरता, सांख्य योग (ज्ञान योग), और निष्काम कर्म योग के विभिन्न आयामों को समझाया है।

चौथे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान की महिमा गाते हुए कर्मों के संन्यास और कर्मयोग दोनों का वर्णन किया था। सामान्य बुद्धि वाले मनुष्य के लिए यह समझना अत्यंत कठिन होता है कि यदि कर्म बंधन का कारण है, तो उसका त्याग क्यों नहीं कर दिया जाए? और यदि कर्म का त्याग ही मोक्ष है, तो फिर भगवान युद्ध जैसी हिंसक प्रक्रिया में भाग लेने का आग्रह क्यों कर रहे हैं? इसी अंतर्विरोध ने अर्जुन को उलझन में डाल दिया। पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच की बातचीत नहीं है, बल्कि यह वेद-वेदांत के सार का वह जीवंत मंथन है जिससे अमृत रूपी ज्ञान प्रकट होता है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और विशेषकर गीता के इस अध्याय की पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि महान ग्रंथ कभी भी कोरे सिद्धांतों का संकलन नहीं होते, बल्कि वे वास्तविक जीवन की समस्याओं, संकटों और मानवीय दुर्बलताओं के उत्तर में प्रगट होते हैं। जब अर्जुन ने एक सच्चे शिष्य की भांति अपने सारे तर्क छोड़कर भगवान के चरणों में समर्पण करते हुए स्पष्ट निर्देश मांगा, तब भगवान ने पांचवें अध्याय में अत्यंत प्रेमपूर्वक यह समझाया कि संन्यास और कर्मयोग दोनों का उद्देश्य एक ही है—परमात्मा की प्राप्ति। हालांकि, अज्ञानियों के लिए दोनों में भेद दिखाई देता है, परंतु तत्त्वज्ञानी दोनों को एक ही रूप में देखते हैं। इस प्रकार यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हमें यह विश्वास दिलाती है कि हमारे जीवन के सबसे बड़े संशय भी सही मार्गदर्शन से पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं।

5. नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रथम श्लोक और इसके मर्म को अपने जीवन में उतारने से साधक को अनेकों मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक स्पष्टता और निर्णय शक्ति का विकास

जीवन के बड़े-बड़े निर्णयों में जब दुविधा उत्पन्न हो, तो इस श्लोक का मनन करने से बुद्धि को सही और गलत का भेद करने की अद्भूत शक्ति मिलती है।

2. आंतरिक संशयों और भय से मुक्ति

अज्ञान के कारण मन में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक भय, शंकाएं और चिंताएं नियमित पाठ से धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का निर्माण

श्लोक के पवित्र संस्कृत वर्णों का उच्चारण शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक औरा का निर्माण करता है.

4. कर्म और धर्म के प्रति गहरी निष्ठा

यह श्लोक साधक को अपने कर्तव्यों से भागने के बजाय, उन्हें पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ निभाने की आंतरिक प्रेरणा प्रदान करता है।

5. कार्मिक शुद्धि और मानसिक शांति

अशांत चित्त को स्थिर करने के लिए गीता के श्लोकों का ध्यान सर्वोत्तम औषधि माना गया है, जिससे चित्त वृत्तियों का निरोध होता है।

6. गुरु और ईश्वर के प्रति शरणागति

अर्जुन की भांति प्रश्न पूछने और उत्तर स्वीकार करने का भाव विकसित होने से अहंकार का नाश होता है और विनम्रता बढ़ती है।

7. आध्यात्मिक जिज्ञासा की जागृति

सांसारिक प्रपंचों से ऊपर उठकर उच्चतर सत्यों को जानने और समझने की तीव्र ललक साधक के भीतर जागृत होने लगती है।

8. भगवत कृपा और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का नियमित अध्ययन साधक को भवसागर से पार लगाने वाले परम मार्ग की ओर निरंतर अग्रसर करता है।

6. संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत, Bhaktilok.in के हमारे विद्वान शोधकर्ताओं, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों ने इस लेख को महर्षि वेदव्यास रचित मूल श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता प्रेस गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण एवं आदि शंकराचार्य तथा स्वामी रामसुखदास जी के टीका ग्रंथों) के आधार पर अत्यंत सावधानी और प्रामाणिकता के साथ तैयार किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल शाब्दिक अनुवाद पहुँचाना नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपी हुई दार्शनिक गहराई, सांस्कृतिक मूल्य और व्यावहारिक प्रासंगिकता को पूरी शुद्धता के साथ प्रस्तुत करना है। इस लेख में दी गई प्रत्येक जानकारी परंपरा और वेदान्त के स्थापित सिद्धांतों के पूर्ण अनुरूप है, जिससे हर साधक इसे बिना किसी संदेह के अपने आध्यात्मिक अभ्यास में सम्मिलित कर सके।

7. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

पिछले अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान के मार्ग (संन्यास) और निष्काम कर्म के मार्ग (कर्मयोग)—दोनों की महिमा बताई थी। अर्जुन समझ नहीं पा रहे थे कि जब दोनों मार्ग अलग-अलग प्रतीत होते हैं, तो उनके लिए कौन सा मार्ग अधिक श्रेयस्कर और कल्याणकारी है। वे यह जानना चाहते थे कि क्या संसार छोड़कर संन्यासी बनना जरूरी है या घर-गृहस्थी में रहकर कर्म करना सही है।

पाँचवें अध्याय का मुख्य विषय 'संन्यासकर्मयोग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि ऊपर से विरोधी दिखने वाले कर्मयोग और सांख्ययोग (संन्यास) वास्तव में एक ही परिणाम यानी परमात्मा की प्राप्ति तक पहुँचाने वाले हैं। जो व्यक्ति आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह वस्तुतः सच्चा संन्यासी ही है।

हाँ, बिल्कुल। निष्काम कर्मयोग का अर्थ अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाना और परिणामों (सफलता या असफलता, लाभ या हानि) के प्रति अत्यधिक आसक्ति न रखना है। आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं, नौकरी, व्यापार और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए भी अपने दायित्वों को सेवाभाव से पूरा करना ही वास्तविक कर्मयोग है।

इस श्लोक और गीता के पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है और भगवान के प्रति शरणागति का भाव मजबूत होता है, जिससे मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

तात्विक दृष्टि से दोनों का गंतव्य एक ही है—ईश्वर की प्राप्ति। संन्यास बाहरी कर्मों का त्याग है (हालांकि मानसिक आसक्ति बिना त्याग के संभव नहीं), जबकि कर्मयोग कर्म करते हुए उसकी फल-आसक्ति का त्याग है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, दोनों ही मार्ग मोक्ष देने वाले हैं, परंतु इनमें कर्मयोग अधिक सुगम और व्यावहारिक है।

© Bhaktilok.in — सर्वाधिकार सुरक्षित | वेदों और पुराणों के प्रामाणिक ज्ञान का डिजिटल भंडार

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन ने कृष्ण से स्पष्ट निर्देश माँगा है – दोनों मार्गों में से कौन-सा निश्चित रूप से कल्याणकारी है। This verse sets the stage for Krishna’s answer that both paths ultimately lead to the same goal, but one is easier to practice.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 1 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 1/29 3% पूर्ण
अगला
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!