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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 1

अध्याय 5 · श्लोक 1

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥

arjuna uvāca sannyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punar-yogaṃ ca śaṃsasi | yac-chreya etayor ekaṃ tan-me brūhi suniścitam ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; संन्यासम्: त्याग; कर्मणाम्: कर्मों का; कृष्ण: हे कृष्ण; पुनः: फिर; योगम्: (कर्म)योग; च: और; शंससि: आप प्रशंसा करते हैं; यत्: जो; श्रेय: कल्याणकारी; एतयोः: इन दोनों में से; एकम्: एक; तत्: वह; मे: मुझे; ब्रूहि: कहिए; सुनिश्चितम्: निश्चयपूर्वक।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की भी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।

English Translation

Arjuna said: O Krishna, you praise renunciation of actions (sannyasa) and also yoga (performance of action). Tell me conclusively which one is better.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा को दर्शाता है। पिछले अध्यायों में कृष्ण ने कर्मयोग और सांख्ययोग (ज्ञान) दोनों की चर्चा की थी। अब अर्जुन स्पष्टता चाहते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।