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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 9

अध्याय 4 · श्लोक 9

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः | त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ||९||

janma karma ca me divyam evaṃ yo vetti tattvataḥ | tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti mām eti so 'rjuna ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

जन्म: जन्म; कर्म: कर्म; च: और; मे: मेरे; दिव्यम्: दिव्य; एवम्: इस प्रकार; यः: जो; वेत्ति: जानता है; तत्त्वतः: तत्त्व से; त्यक्त्वा: त्यागकर; देहम्: शरीर को; पुनर्जन्म: पुनर्जन्म; न: नहीं; एति: पाता; माम्: मुझको; एति: प्राप्त होता है; सः: वह; अर्जुन: हे अर्जुन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे अर्जुन! जो मेरे दिव्य जन्म और कर्मों को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझको ही प्राप्त होता है।

English Translation

He who thus knows, in true light, My divine birth and actions, after leaving the body, is not born again; he comes to Me, O Arjuna.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ईश्वर के दिव्य जन्म और कर्मों को यथार्थ रूप से जानने का फल – मोक्ष। जो यह समझ लेता है कि कृष्ण का जन्म और कर्म साधारण नहीं, बल्कि दिव्य हैं, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।