ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 10
श्लोक १० में कृष्ण कहते हैं कि अनेक पूर्वज राग-भय-क्रोध से मुक्त होकर, ज्ञान से पवित्र होकर उनके स्वरूप को प्राप्त हुए हैं।
संस्कृत श्लोक
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ||१०||
vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśritāḥ | bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ ||10||
पदच्छेद / शब्दार्थ
वीतरागभयक्रोधाः: राग, भय और क्रोध से रहित; मन्मयाः: मुझमें तन्मय; माम्: मेरी; उपाश्रिताः: शरण में; बहवः: अनेक; ज्ञानतपसा: ज्ञानरूपी तप से; पूताः: पवित्र हुए; मद्भावम्: मेरे भाव (स्वरूप) को; आगताः: प्राप्त हुए।
हिंदी अनुवाद
राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय, मेरी शरण में रहकर, ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए अनेक लोग मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हुए हैं।
English Translation
Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My Being.
टीका / Commentary
कृष्ण उदाहरण देते हैं कि अनेक भक्त पहले भी इस मार्ग से मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं। शर्तें हैं – राग, भय, क्रोध से मुक्ति, ईश्वर में तन्मयता, और ज्ञानरूपी तप से पवित्रता।