ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 11

श्लोक ११ में कृष्ण कहते हैं कि जो जिस प्रकार उन्हें भजता है, वे उसे उसी प्रकार भजते हैं।

संस्कृत श्लोक

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||११||

ye yathā māṃ prapadyante tāṃs tathaiva bhajāmy aham | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||11||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ये: जो; यथा: जैसे; माम्: मुझको; प्रपद्यन्ते: भजते हैं; तान्: उनको; तथा: वैसे; एव: ही; भजामि: भजता हूँ; अहम्: मैं; मम: मेरे; वर्त्म: मार्ग का; अनुवर्तन्ते: अनुसरण करते हैं; मनुष्याः: मनुष्य; पार्थ: हे पार्थ; सर्वशः: सब प्रकार से।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उनको उसी प्रकार भजता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

English Translation

In whatever way men approach Me, even so do I reward them. My path do men tread in all ways, O Arjuna.

टीका / Commentary

यह श्लोक ईश्वर की सर्वसमावेशकता को दर्शाता है। विभिन्न साधक विभिन्न भावों से ईश्वर की उपासना करते हैं, और ईश्वर उन्हें उनके भाव के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। कोई भी सच्चा मार्ग ईश्वर से अलग नहीं है।