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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 11

अध्याय 4 · श्लोक 11

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||११||

ye yathā māṃ prapadyante tāṃs tathaiva bhajāmy aham | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ये: जो; यथा: जैसे; माम्: मुझको; प्रपद्यन्ते: भजते हैं; तान्: उनको; तथा: वैसे; एव: ही; भजामि: भजता हूँ; अहम्: मैं; मम: मेरे; वर्त्म: मार्ग का; अनुवर्तन्ते: अनुसरण करते हैं; मनुष्याः: मनुष्य; पार्थ: हे पार्थ; सर्वशः: सब प्रकार से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उनको उसी प्रकार भजता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

English Translation

In whatever way men approach Me, even so do I reward them. My path do men tread in all ways, O Arjuna.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक ईश्वर की सर्वसमावेशकता को दर्शाता है। विभिन्न साधक विभिन्न भावों से ईश्वर की उपासना करते हैं, और ईश्वर उन्हें उनके भाव के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। कोई भी सच्चा मार्ग ईश्वर से अलग नहीं है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।