आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 12

अध्याय 4 · श्लोक 12

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||१२||

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ | kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhir bhavati karmajā ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

काङ्क्षन्तः: इच्छा करते हुए; कर्मणाम्: कर्मों की; सिद्धिम्: सिद्धि (सफलता); यजन्ते: पूजते हैं; इह: इस लोक में; देवताः: देवताओं को; क्षिप्रम्: शीघ्र; हि: निश्चय ही; मानुषे: मनुष्यों के; लोके: लोक में; सिद्धिः: सिद्धि; भवति: होती है; कर्मजा: कर्मों से उत्पन्न।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस लोक में (सामान्य मनुष्य) कर्मों की सिद्धि (सफलता) की इच्छा से देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।

English Translation

Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण यहाँ सांसारिक लोगों की प्रवृत्ति बताते हैं। वे शीघ्र फल चाहते हैं, इसलिए देवताओं की पूजा करते हैं। यह सांसारिक कर्मकाण्ड का मार्ग है, जो शीघ्र फल देता है, किन्तु अस्थायी है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।