ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 12
श्लोक १२ में कृष्ण कहते हैं कि सांसारिक लोग शीघ्र फल की इच्छा से देवताओं को पूजते हैं।
संस्कृत श्लोक
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||१२||
kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ | kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhir bhavati karmajā ||12||
पदच्छेद / शब्दार्थ
काङ्क्षन्तः: इच्छा करते हुए; कर्मणाम्: कर्मों की; सिद्धिम्: सिद्धि (सफलता); यजन्ते: पूजते हैं; इह: इस लोक में; देवताः: देवताओं को; क्षिप्रम्: शीघ्र; हि: निश्चय ही; मानुषे: मनुष्यों के; लोके: लोक में; सिद्धिः: सिद्धि; भवति: होती है; कर्मजा: कर्मों से उत्पन्न।
हिंदी अनुवाद
इस लोक में (सामान्य मनुष्य) कर्मों की सिद्धि (सफलता) की इच्छा से देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।
English Translation
Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action.
टीका / Commentary
कृष्ण यहाँ सांसारिक लोगों की प्रवृत्ति बताते हैं। वे शीघ्र फल चाहते हैं, इसलिए देवताओं की पूजा करते हैं। यह सांसारिक कर्मकाण्ड का मार्ग है, जो शीघ्र फल देता है, किन्तु अस्थायी है।