ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 8
श्लोक ८ में कृष्ण अवतार के तीन उद्देश्य बताते हैं – सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश, धर्म की स्थापना।
संस्कृत श्लोक
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||८||
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām | dharma-saṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||8||
पदच्छेद / शब्दार्थ
परित्राणाय: रक्षा के लिए; साधूनाम्: साधुओं (सज्जनों) की; विनाशाय: विनाश के लिए; च: और; दुष्कृताम्: दुष्कर्मियों (दुष्टों) का; धर्मसंस्थापनार्थाय: धर्म की स्थापना के लिए; सम्भवामि: प्रकट होता हूँ; युगे युगे: युग-युग में।
हिंदी अनुवाद
साधुओं (सज्जनों) की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
English Translation
For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the establishment of righteousness, I am born in every age.
टीका / Commentary
यह श्लोक पिछले श्लोक को विस्तार से समझाता है। अवतार के तीन उद्देश्य हैं – साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश, और धर्म की स्थापना। युगे-युगे का अर्थ है कि यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है, केवल एक बार नहीं।