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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 8

अध्याय 4 · श्लोक 8

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||८||

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām | dharma-saṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

परित्राणाय: रक्षा के लिए; साधूनाम्: साधुओं (सज्जनों) की; विनाशाय: विनाश के लिए; च: और; दुष्कृताम्: दुष्कर्मियों (दुष्टों) का; धर्मसंस्थापनार्थाय: धर्म की स्थापना के लिए; सम्भवामि: प्रकट होता हूँ; युगे युगे: युग-युग में।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

साधुओं (सज्जनों) की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

English Translation

For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the establishment of righteousness, I am born in every age.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक पिछले श्लोक को विस्तार से समझाता है। अवतार के तीन उद्देश्य हैं – साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश, और धर्म की स्थापना। युगे-युगे का अर्थ है कि यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है, केवल एक बार नहीं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।