ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में कृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ।

संस्कृत श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||७||

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham ||7||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यदा यदा: जब-जब; हि: निश्चय ही; धर्मस्य: धर्म की; ग्लानिः: हानि; भवति: होती है; भारत: हे भारत; अभ्युत्थानम्: वृद्धि; अधर्मस्य: अधर्म की; तदा: तब; आत्मानम्: अपने को; सृजामि: प्रकट करता हूँ; अहम्: मैं।

हिंदी अनुवाद

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

English Translation

Whenever there is a decline of righteousness and rise of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself.

टीका / Commentary

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है जो अवतार के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। ईश्वर के अवतरण का समय संकट का समय होता है – जब धर्म दबने लगता है और अधर्म बढ़ने लगता है। यह ईश्वर की लीला का उद्देश्य बताता है।