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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 7

अध्याय 4 · श्लोक 7

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||७||

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यदा यदा: जब-जब; हि: निश्चय ही; धर्मस्य: धर्म की; ग्लानिः: हानि; भवति: होती है; भारत: हे भारत; अभ्युत्थानम्: वृद्धि; अधर्मस्य: अधर्म की; तदा: तब; आत्मानम्: अपने को; सृजामि: प्रकट करता हूँ; अहम्: मैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

English Translation

Whenever there is a decline of righteousness and rise of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है जो अवतार के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। ईश्वर के अवतरण का समय संकट का समय होता है – जब धर्म दबने लगता है और अधर्म बढ़ने लगता है। यह ईश्वर की लीला का उद्देश्य बताता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।