श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 6

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 56 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
अजः
अजन्मा
अपि
यद्यपि
सन्
हूँ
अव्ययात्मा
अविनाशी स्वरूप वाला
भूतानाम्
प्राणियों का
ईश्वरः
ईश्वर
अपि
भी
सन्
हूँ
प्रकृतिम्
प्रकृति को
स्वाम्
अपनी
अधिष्ठाय
अधिष्ठान करके
सम्भवामि
प्रकट होता हूँ
आत्ममायया
अपनी माया से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी स्वरूप वाला और सब प्राणियों का ईश्वर हूँ, तो भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठान करके, अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

सनातन धर्म और भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन की उलझनों को सुलझाने और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की सामर्थ्य रखता है। चतुर्थ अध्याय के श्लोक संख्या 6 में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्राकट्य, अपने दिव्य जन्म और अपनी अचिंत्य शक्ति का जो रहस्योद्घाटन किया है, वह संपूर्ण वेदांत और सनातन संस्कृति का सार है। यह श्लोक केवल एक संस्कृत का छंद मात्र नहीं है, अपितु यह "अवतारवाद" का मूल मंत्र है, जो जीव और ईश्वर के अलौकिक संबंध को परिभाषित करता है।

साधारण मनुष्य और ईश्वर के अवतरण में क्या अंतर है? साधारण जीव अपने कर्मों के बंधन (कर्मफल) के अधीन होकर इस संसार में जन्म लेता है—वह प्रकृति के नियमों से बंधा होता है। इसके विपरीत, जगत के पालनहार, समस्त भूतों के ईश्वर और अजन्मा भगवान जब इस धरा पर उतरते हैं, तो वे किसी साधारण जीव की तरह कर्मों के अधीन नहीं होते। वे अपनी ही योगमाया के बल पर स्वेच्छा से प्रकट होते हैं। इस श्लोक का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को भगवान के प्रति अटूट विश्वास और भक्ति का मार्ग दिखाता है, यह याद दिलाता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब निर्विकार परमात्मा स्वयं को अपनी माया से प्रकट करते हैं।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह श्लोक अद्वैत और द्वैत के उस अद्भुत समन्वय को दर्शाता है जहाँ निराकार ब्रह्म ही साकार रूप धारण कर भक्तों के संताप को दूर करने के लिए लीलाएं करता है। आधुनिक युग की व्यस्तता और मानसिक अशांति के दौर में, इस श्लोक के गूढ़ अर्थ को समझना और इसका स्मरण करना साधक को आंतरिक शक्ति, मानसिक शांति और जीवन के उच्चतर लक्ष्यों के प्रति जागरूक करता है। यह लेख Bhaktilok.in के पाठकों के लिए इसी दिव्य श्लोक के विस्तृत अध्ययन, व्याकरणिक विश्लेषण, और व्यावहारिक आध्यात्मिक लाभों को प्रस्तुत करने का एक विनम्र और प्रामाणिक प्रयास है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के इस पावन श्लोक का पाठ श्रद्धा, पवित्रता और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। यहाँ इसका प्रामाणिक संस्कृत पाठ देवनागरी लिपि और रोमन लिपि (IAST) दोनों में प्रस्तुत है, ताकि साधक इसका शुद्ध उच्चारण कर सकें:

ॐ श्री परमात्मने नमः

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥


(Ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san |
Prakṛtiṁ svāmadhiṣṭhāya sambhavāmyātmamāyayā || 6 ||)

पाठ करने की सरल विधि एवं नियम:
  • शुद्धता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने इष्टदेव (विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण या विष्णु जी) का ध्यान करें।
  • स्थान: पूजा घर में या किसी शांत एकांत स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • उच्चारण: श्लोक का उच्चारण स्पष्ट और सस्वर करें। प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का ध्यान रखें।
  • संकल्प: पाठ करने से पूर्व अपने मन में भगवान के प्रति समर्पण का भाव रखें और इस श्लोक का कम से कम 11 या 21 बार जप करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदों और उपनिषदों का अगाध ज्ञान छिपा है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों का सटीक हिंदी अर्थ और उनका विस्तृत दार्शनिक भावार्थ समझाया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual & Philosophical Meaning)
अजः अपि (Ajo'pi) अजन्मा होते हुए भी भगवान का जन्म सामान्य जीवों की तरह नहीं होता। वे कभी जन्म नहीं लेते, वे सनातन और शाश्वत हैं।
सन् (San) होते हुए (विद्यमान रहते हुए) अपनी मूल अवस्था में अपरिवर्तित रहते हुए भी वे संसार में भौतिक रूप धारण करते हैं।
अव्यय-आत्मा (Avyayātmā) अविनाशी स्वरूप वाले, जिसका कभी क्षय न हो भगवान की आत्मा या उनका स्वरूप कभी क्षीण, वृद्ध या मृत नहीं होता; वे सदा एकरस और पूर्ण हैं।
भूतानाम् (Bhūtānām) समस्त जीवों, प्राणियों के सृष्टि के जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन सबकी उत्पत्ति और स्थिति का आधार वही हैं।
ईश्वरः अपि सन् (Īśvaro'pi san) समस्त जगत के स्वामी (ईश्वर) होते हुए भी वे संपूर्ण ब्रह्मांड के सर्वोच्च नियंत्रक और स्वामी हैं, फिर भी भक्तों के प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं।
प्रकृतिम् (Prakṛtim) अपनी प्रकृति को, अपनी माया शक्ति को वे बाहरी प्रकृति या जड़ पदार्थ के अधीन नहीं होते, बल्कि अपनी त्रैगुणात्मिका शक्ति को अपने नियंत्रण में रखते हैं।
स्वाम् (Svām) अपनी (स्वयं की) यह प्रकृति कोई पराई या स्वतंत्र शक्ति नहीं है, अपितु भगवान की अपनी ही अंतरंग शक्ति (योगमाया) है।
अधिष्ठाय (Adhiṣṭhāya) धीन करके, नियंत्रण में रखकर, आश्रय लेकर अपनी उस प्रकृति को अपने अधीन या वश में करके भगवान प्रकट होते हैं।
सम्भवामि (Sambhavāmi) मैं प्रकट होता हूँ, अवतार लेता हूँ भगवान का प्रकट होना किसी योनि के कर्मफल का परिणाम नहीं, बल्कि उनकी अपनी अहैतुकी कृपा और संकल्प है।
आत्म-मायया (Ātmamāyayā) अपनी योगमाया के द्वारा यह प्राकट्य साधारण माया (जो जीवों को बांधती है) से नहीं, बल्कि उनकी अचिंत्य और दिव्य योगमाया से होता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस चतुर्थ अध्याय का नाम 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' है। इस अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण सूर्यदेव (विवस्वान) को इस प्राचीन योग का उपदेश देने की बात कहते हैं। इस पर अर्जुन के मन में एक तार्किक जिज्ञासा उत्पन्न होती है—अर्जुन पूछते हैं कि हे कृष्ण! आपका जन्म तो अभी कुछ समय पूर्व हुआ है और सूर्य तो बहुत प्राचीन काल से विद्यमान हैं, फिर मैं कैसे मानूँ कि आपने कल्प के आरंभ में सूर्य को यह योग सिखाया था?

अर्जुन की इसी शंका का समाधान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जन्मों के रहस्य को उजागर किया। भगवान ने अर्जुन से कहा—"हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। तुम उन सबको नहीं जानते, किंतु मैं उन सबको जानता हूँ।" इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भगवान ने प्रस्तुत श्लोक (अजोऽपि सन्नव्ययात्मा...) के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि यद्यपि वे अजन्मा और अव्यय हैं, तथापि वे धर्म की स्थापना और दुष्टों के संहार के लिए स्वेच्छा से प्रकट होते हैं।

पौराणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण, महाभारत और विभिन्न उपनिषदों में इस सिद्धांत का विस्तार से वर्णन मिलता है। जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में देवकी और वासुदेव के यहाँ हुआ, तब वह साधारण शिशु का जन्म नहीं था, अपितु चतुर्भुज रूप में उनका प्राकट्य इस बात का प्रमाण था कि वे प्रकृति के बंधनों से मुक्त होकर अपनी योगमाया से प्रकट हुए थे। इसी प्रकार भगवान राम का त्रेतायुग में अवतार लेना भी इसी दिव्य विधान के अंतर्गत आता है। वेद और पुराण एक स्वर में यह स्वीकार करते हैं कि परमब्रह्म जब भी साकार रूप में धरती पर आते हैं, तो वे अपनी योगमाया का आवरण ओढ़ लेते हैं, ताकि साधारण मनुष्य उन्हें अपनी बुद्धि से समझ सकें, यद्यपि उनके वास्तविक स्वरूप को केवल ज्ञानी और भक्त ही जान पाते हैं।

ऋषियों और मुनियों ने इस श्लोक को 'अवतार रहस्य' का सबसे बड़ा प्रमाण माना है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ईश्वर का मनुष्य रूप में अवतरण कोई कमजोरी या मजबूरी नहीं है, बल्कि यह उनकी असीम करुणा का प्रत्यक्ष स्वरूप है जो वे अपने भक्तों के कल्याण के लिए धारण करते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस छठे श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. अगाध मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक का स्मरण करने से मन के संशय, भय और चिंताएं समाप्त होती हैं। यह विश्वास पैदा होता है कि इस संसार का संचालन एक सर्वोच्च और दयालु ईश्वर के हाथ में है, जिससे मन को गहरी शांति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का संचार

संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करते हैं और साधक के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा व औरा (Aura) को मजबूत करते हैं।

3. कर्म बंधनों और पापों का शमन

भगवान के दिव्य जन्म और उनके स्वरूप का निरंतर चिंतन करने से साधक के चित्त की शुद्धि होती है। यह कर्मों के नकारात्मक प्रभावों को क्षीण करने में आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है।

4. अनन्य भक्ति और भगवान की कृपा

जब भक्त यह समझ जाता है कि भगवान उसकी रक्षा के लिए अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं, तो उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण (भक्ति) की भावना प्रगाढ़ हो जाती है।

5. जीवन के संकटों से उबरने की शक्ति

जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों और असफलताओं के समय यह श्लोक अजेय आत्मबल प्रदान करता है। यह सिखाता है कि जैसे भगवान अपनी माया से हर संकट को पार कर लेते हैं, वैसे ही भक्त भी उनकी कृपा से तर जाता है।

6. अद्वैत और ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

यह श्लोक साधक की बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, जिससे वह स्थूल संसार से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के शाश्वत सत्य को समझने की दिशा में आगे बढ़ता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री प्राचीन आर्ष ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य, रामानुज भाष्य और स्वामी गीतानंद जी के टीका ग्रंथों) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल सिद्धांतों, वेदों और उपनिषदों के संदेश को आधुनिक पाठकों तक सरल, स्पष्ट और अकाट्य प्रमाणिकता के साथ पहुँचाना है। इस लेख में दी गई प्रत्येक जानकारी पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा और शास्त्रीय मान्यताओं के पूर्ण सम्मान के साथ संकलित की गई है, ताकि हमारे पाठकों को उच्चतम स्तर की आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्री प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय (ज्ञानकर्मसंन्यासयोग) का छठा (6th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और ज्ञान के गूढ़ रहस्यों के साथ अपने अवतार लेने के सिद्धांत को समझाया है।

उत्तर: साधारण मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों (कर्मफल) और प्रकृति के अधीन होकर विवशतापूर्वक जन्म लेता है, जबकि भगवान अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी अपने संकल्प और अपनी अचिंत्य योगमाया के बल पर स्वेच्छा से, धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

उत्तर: योगमाया भगवान की वह अंतरंग और दिव्य शक्ति है जिसके माध्यम से वे प्रकृति को अपने अधीन रखते हैं। साधारण माया जीवों को संसार के मोह-माया में बांधती है, किंतु भगवान की योगमाया शुद्ध, दिव्य और उनके ऐश्वर्य का प्रतीक होती है जिससे वे संसार को प्रकट और नियंत्रित करते हैं।

उत्तर: इस श्लोक के नियमित पाठ और मनन से मन का अविश्वास, भय, और भविष्य की चिंताएं दूर होती हैं। साधक के भीतर यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न होता है कि संकट के समय ईश्वर उसकी रक्षा के लिए अवश्य उपस्थित होते हैं, जिससे अत्यधिक मानसिक शांति मिलती है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। यह श्लोक सनातन धर्म के 'अवतारवाद' का सबसे प्रमुख और प्रामाणिक आधार स्तंभ है। यह वेदों और उपनिषदों के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है जिसमें ब्रह्म के सगुण और साकार रूप में प्रकट होकर भक्तों का कल्याण करने का वर्णन मिलता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को वश में करके, अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। Though I am unborn, imperishable, and the Lord of all beings, yet I manifest Myself through My own divine power, controlling My material nature.

दिव्य जन्म / Divine Birth

यह श्लोक ईश्वर के दिव्य जन्म (अवतार) की व्याख्या करता है। उनका जन्म कर्मों से बंधा नहीं होता, बल्कि वे अपनी इच्छा और शक्ति से प्रकट होते हैं। This verse explains that the Lord's appearance is not forced by karma but is a voluntary descent for the welfare of the world.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/42 14% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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