ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 6

श्लोक ६ में कृष्ण अवतार के रहस्य का उद्घाटन करते हैं – वे अजन्मा होते हुए भी अपनी माया से प्रकट होते हैं।

संस्कृत श्लोक

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||६||

ajo 'pi sann avyayātmā bhūtānām īśvaro 'pi san | prakṛtiṃ svām adhiṣṭhāya sambhavāmy ātma-māyayā ||6||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अजः: अजन्मा; अपि: यद्यपि; सन्: हूँ; अव्ययात्मा: अविनाशी स्वरूप वाला; भूतानाम्: प्राणियों का; ईश्वरः: ईश्वर; अपि: भी; सन्: हूँ; प्रकृतिम्: प्रकृति को; स्वाम्: अपनी; अधिष्ठाय: अधिष्ठान करके; सम्भवामि: प्रकट होता हूँ; आत्ममायया: अपनी माया से।

हिंदी अनुवाद

यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी स्वरूप वाला और सब प्राणियों का ईश्वर हूँ, तो भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठान करके, अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

English Translation

Though I am unborn and of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing My own nature, I am born by My own Maya.

टीका / Commentary

यह श्लोक अवतारवाद का मूल मंत्र है। ईश्वर का जन्म साधारण जीवों के समान कर्मबद्ध नहीं होता। वह अपनी इच्छा से, अपनी योगमाया से, अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होता है। वह अजन्मा होते हुए भी जन्म लेता है।