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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 6

अध्याय 4 · श्लोक 6

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||६||

ajo 'pi sann avyayātmā bhūtānām īśvaro 'pi san | prakṛtiṃ svām adhiṣṭhāya sambhavāmy ātma-māyayā ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अजः: अजन्मा; अपि: यद्यपि; सन्: हूँ; अव्ययात्मा: अविनाशी स्वरूप वाला; भूतानाम्: प्राणियों का; ईश्वरः: ईश्वर; अपि: भी; सन्: हूँ; प्रकृतिम्: प्रकृति को; स्वाम्: अपनी; अधिष्ठाय: अधिष्ठान करके; सम्भवामि: प्रकट होता हूँ; आत्ममायया: अपनी माया से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी स्वरूप वाला और सब प्राणियों का ईश्वर हूँ, तो भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठान करके, अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

English Translation

Though I am unborn and of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing My own nature, I am born by My own Maya.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अवतारवाद का मूल मंत्र है। ईश्वर का जन्म साधारण जीवों के समान कर्मबद्ध नहीं होता। वह अपनी इच्छा से, अपनी योगमाया से, अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होता है। वह अजन्मा होते हुए भी जन्म लेता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।