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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 5

अध्याय 4 · श्लोक 5

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन | तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||५||

śrī-bhagavān uvāca | bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna | tāny ahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; बहूनि: अनेक; मे: मेरे; व्यतीतानि: बीत चुके हैं; जन्मानि: जन्म; तव: तुम्हारे; च: और; अर्जुन: हे अर्जुन; तानि: उनको; अहम्: मैं; वेद: जानता हूँ; सर्वाणि: सभी; न: नहीं; त्वम्: तुम; वेत्थ: जानते हो; परन्तप: हे परन्तप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, परन्तु हे परन्तप! तुम नहीं जानते।

English Translation

The Blessed Lord said: Many births of Mine have passed, as well as of yours, O Arjuna. I know them all, but you do not know, O scorcher of foes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण यहाँ आत्मा की पुनर्जन्म की यात्रा और ईश्वर की सर्वज्ञता का रहस्य बता रहे हैं। जहाँ साधारण जीव अपने पिछले जन्मों को भूल जाता है, वहीं ईश्वर को सब ज्ञात रहता है। यह कृष्ण के दिव्य स्वरूप का प्रथम संकेत है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।