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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 3

अध्याय 4 · श्लोक 3

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः | भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||३||

sa evāyaṃ mayā te 'dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ | bhakto 'si me sakhā ceti rahasyaṃ hy etad uttamam ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सः: वही; एव: निश्चय ही; अयम्: यह; मया: मेरे द्वारा; ते: तुमसे; अद्य: आज; योगः: योग; प्रोक्तः: कहा गया; पुरातनः: प्राचीन; भक्तः: भक्त; असि: हो; मे: मेरा; सखा: मित्र; च: और; इति: इसलिए; रहस्यम्: रहस्य; हि: निश्चय ही; एतत्: यह; उत्तमम्: उत्तम।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वही यह प्राचीन योग आज मेरे द्वारा तुमसे कहा गया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।

English Translation

That same ancient yoga has been today taught to you by Me, for you are My devotee and My friend; it is the supreme secret.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अर्जुन को विशेषाधिकार बताते हैं कि वही प्राचीन योग आज उन्हें दिया जा रहा है। इसका कारण है – अर्जुन उनके भक्त और मित्र हैं। यहाँ भक्ति और मित्रता दोनों को ज्ञान प्राप्ति के लिए आधार बताया गया है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।