ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 2

श्लोक २ में कृष्ण कहते हैं कि यह योग राजर्षियों द्वारा जाना जाता था, परन्तु कालान्तर में वह लुप्त हो गया।

संस्कृत श्लोक

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः | स केनेनापि योगेन भ्रष्टः परन्तप ||२||

evam paramparā-prāptam imaṃ rājarṣayo viduḥ | sa kālenāpi yogena braṣṭaḥ parantapa ||2||

पदच्छेद / शब्दार्थ

एवम्: इस प्रकार; परम्पराप्राप्तम्: परम्परा से प्राप्त; इमम्: इस; राजर्षयः: राजर्षियों ने; विदुः: जाना; सः: वह; कालेन: काल के प्रभाव से; अपि: भी; योगेन: योग से; भ्रष्टः: नष्ट; परन्तप: हे परन्तप।

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस (योग) को राजर्षियों ने जाना। परन्तु हे परन्तप! काल के प्रभाव से वह योग लुप्त हो गया।

English Translation

Thus handed down in succession, the royal sages knew it. But with the long lapse of time, it has been lost, O scorcher of foes.

टीका / Commentary

यह योग ज्ञान राजर्षियों (जो राजा भी थे और ऋषि भी) द्वारा परम्परा से प्राप्त किया जाता रहा। किन्तु लम्बे समय के बाद यह परम्परा टूट गई और ज्ञान लुप्तप्राय हो गया। कृष्ण यहाँ योग के पुनरुद्धार की आवश्यकता बता रहे हैं।