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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 2

अध्याय 4 · श्लोक 2

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः | स केनेनापि योगेन भ्रष्टः परन्तप ||२||

evam paramparā-prāptam imaṃ rājarṣayo viduḥ | sa kālenāpi yogena braṣṭaḥ parantapa ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एवम्: इस प्रकार; परम्पराप्राप्तम्: परम्परा से प्राप्त; इमम्: इस; राजर्षयः: राजर्षियों ने; विदुः: जाना; सः: वह; कालेन: काल के प्रभाव से; अपि: भी; योगेन: योग से; भ्रष्टः: नष्ट; परन्तप: हे परन्तप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस (योग) को राजर्षियों ने जाना। परन्तु हे परन्तप! काल के प्रभाव से वह योग लुप्त हो गया।

English Translation

Thus handed down in succession, the royal sages knew it. But with the long lapse of time, it has been lost, O scorcher of foes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह योग ज्ञान राजर्षियों (जो राजा भी थे और ऋषि भी) द्वारा परम्परा से प्राप्त किया जाता रहा। किन्तु लम्बे समय के बाद यह परम्परा टूट गई और ज्ञान लुप्तप्राय हो गया। कृष्ण यहाँ योग के पुनरुद्धार की आवश्यकता बता रहे हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।