ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 1
श्लोक १ में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग सूर्य से मनु और मनु से इक्ष्वाकु तक परम्परा से प्राप्त हुआ है।
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||१||
śrī-bhagavān uvāca | imaṃ vivasvate yogaṃ proktavān aham avyayam | vivasvān manave prāha manur ikṣvākave 'bravīt ||1||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; इमम्: इस; विवस्वते: विवस्वान (सूर्य) को; योगम्: योग को; प्रोक्तवान्: कहा था; अहम्: मैंने; अव्ययम्: अविनाशी; विवस्वान्: विवस्वान् ने; मनवे: मनु को; प्राह: कहा; मनुः: मनु ने; इक्ष्वाकवे: इक्ष्वाकु को; अब्रवीत्: कहा।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान्) से कहा था। सूर्य ने इसे मनु को कहा और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया।
English Translation
The Blessed Lord said: I taught this imperishable Yoga to Vivasvan (the Sun-god); he taught it to Manu; Manu taught it to Ikshvaku.
टीका / Commentary
कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग कोई नई रचना नहीं है, बल्कि एक प्राचीन परम्परा है। सृष्टि के आरम्भ में यह ज्ञान सूर्य को दिया गया, जो मनु के माध्यम से इक्ष्वाकु वंश तक पहुँचा। यह ज्ञान की गुरु-शिष्य परम्परा (मौखिक परम्परा) का महत्व दर्शाता है।