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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 1

अध्याय 4 · श्लोक 1

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||१||

śrī-bhagavān uvāca | imaṃ vivasvate yogaṃ proktavān aham avyayam | vivasvān manave prāha manur ikṣvākave 'bravīt ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; इमम्: इस; विवस्वते: विवस्वान (सूर्य) को; योगम्: योग को; प्रोक्तवान्: कहा था; अहम्: मैंने; अव्ययम्: अविनाशी; विवस्वान्: विवस्वान् ने; मनवे: मनु को; प्राह: कहा; मनुः: मनु ने; इक्ष्वाकवे: इक्ष्वाकु को; अब्रवीत्: कहा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान्) से कहा था। सूर्य ने इसे मनु को कहा और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया।

English Translation

The Blessed Lord said: I taught this imperishable Yoga to Vivasvan (the Sun-god); he taught it to Manu; Manu taught it to Ikshvaku.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग कोई नई रचना नहीं है, बल्कि एक प्राचीन परम्परा है। सृष्टि के आरम्भ में यह ज्ञान सूर्य को दिया गया, जो मनु के माध्यम से इक्ष्वाकु वंश तक पहुँचा। यह ज्ञान की गुरु-शिष्य परम्परा (मौखिक परम्परा) का महत्व दर्शाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।