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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 27

अध्याय 4 · श्लोक 27

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे | आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ||२७||

sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi cāpare | ātma-saṃyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite ||27||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सर्वाणि: सब; इन्द्रियकर्माणि: इन्द्रियों के कर्मों को; प्राणकर्माणि: प्राणों के कर्मों को; च: और; अपरे: अन्य; आत्मसंयमयोगाग्नौ: आत्म-संयमरूपी योग की अग्नि में; जुह्वति: हवन करते हैं; ज्ञानदीपिते: ज्ञान से प्रदीप्त।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अन्य (योगी) सब इन्द्रियों के कर्मों और प्राणों के कर्मों को, ज्ञान से प्रदीप्त आत्म-संयमरूपी योग की अग्नि में हवन करते हैं।

English Translation

Others again sacrifice all the functions of the senses and those of the breath (vital energy) in the fire of the Yoga of self-restraint, kindled by knowledge.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ साधना का उच्चतम स्तर बताया गया है – समस्त इन्द्रिय-व्यापार और प्राण-व्यापार को आत्म-संयमरूपी योग की अग्नि में आहुति दे देना। यह अग्नि ज्ञान से प्रज्वलित होती है, अर्थात यह कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ज्ञानपूर्वक की गई साधना है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।