ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 26

श्लोक २६ में इन्द्रिय-संयम के दो प्रकार बताए गए हैं।

संस्कृत श्लोक

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||२६||

śrotrādīnīndriyāṇy anye saṃyamāgniṣu juhvati | śabdādīn viṣayān anya indriyāgniṣu juhvati ||26||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्रोत्रादीनि: श्रोत्र आदि; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; अन्ये: अन्य (योगी); संयमाग्निषु: संयमरूपी अग्नि में; जुह्वति: हवन करते हैं; शब्दादीन्: शब्द आदि; विषयान्: विषयों को; अन्ये: अन्य; इन्द्रियाग्निषु: इन्द्रियरूपी अग्नि में; जुह्वति: हवन करते हैं।

हिंदी अनुवाद

कितने ही (योगी) श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (योगी) शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं।

English Translation

Some again offer the organ of hearing and other senses as a sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as a sacrifice in the fire of the senses.

टीका / Commentary

यहाँ इन्द्रिय-संयम के दो रूप बताए गए हैं – एक में इन्द्रियों की क्रियाशीलता को ही रोककर संयम में हवन किया जाता है; दूसरे में विषयों (शब्द, स्पर्श आदि) को इन्द्रियों के माध्यम से ही भस्म कर दिया जाता है, अर्थात विषयों के प्रति आसक्ति न रखकर उनका उपभोग किया जाता है।