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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 26

अध्याय 4 · श्लोक 26

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||२६||

śrotrādīnīndriyāṇy anye saṃyamāgniṣu juhvati | śabdādīn viṣayān anya indriyāgniṣu juhvati ||26||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रोत्रादीनि: श्रोत्र आदि; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; अन्ये: अन्य (योगी); संयमाग्निषु: संयमरूपी अग्नि में; जुह्वति: हवन करते हैं; शब्दादीन्: शब्द आदि; विषयान्: विषयों को; अन्ये: अन्य; इन्द्रियाग्निषु: इन्द्रियरूपी अग्नि में; जुह्वति: हवन करते हैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कितने ही (योगी) श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (योगी) शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं।

English Translation

Some again offer the organ of hearing and other senses as a sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as a sacrifice in the fire of the senses.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ इन्द्रिय-संयम के दो रूप बताए गए हैं – एक में इन्द्रियों की क्रियाशीलता को ही रोककर संयम में हवन किया जाता है; दूसरे में विषयों (शब्द, स्पर्श आदि) को इन्द्रियों के माध्यम से ही भस्म कर दिया जाता है, अर्थात विषयों के प्रति आसक्ति न रखकर उनका उपभोग किया जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।