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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 25

अध्याय 4 · श्लोक 25

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते | ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ||२५||

daivam evāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate | brahmāgnāv apare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati ||25||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दैवम्: देवताओं सम्बन्धी; एव: ही; अपरे: अन्य; यज्ञम्: यज्ञ को; योगिनः: योगी; पर्युपासते: उपासना करते हैं; ब्रह्माग्नौ: ब्रह्मरूपी अग्नि में; अपरे: अन्य; यज्ञम्: यज्ञ को; यज्ञेन: यज्ञ द्वारा; एव: ही; उपजुह्वति: हवन करते हैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कितने ही योगी देवताओं के यज्ञ की उपासना करते हैं, और दूसरे (अन्य योगी) ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।

English Translation

Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ यज्ञ के दो स्तर बताए गए हैं – बाह्य यज्ञ (देवताओं की उपासना) और आन्तरिक यज्ञ (आत्म-साक्षात्कार के लिए किए गए साधना-यज्ञ)। दूसरे प्रकार के योगी साधना के साधनों (यज्ञ) को ही ब्रह्म में हवन कर देते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।