ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 24

श्लोक २४ में अद्वैत भाव से कर्म करने का उच्चतम स्तर बताया गया है।

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||२४||

brahmārpaṇaṃ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam | brahmaiva tena gantavyaṃ brahma-karma-samādhinā ||24||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ब्रह्म: ब्रह्म; अर्पणम्: अर्पण करने की क्रिया; ब्रह्म: ब्रह्म; हविः: हवि (आहुति); ब्रह्माग्नौ: ब्रह्मरूपी अग्नि में; ब्रह्मणा: ब्रह्म द्वारा; हुतम्: हवन किया गया; ब्रह्म: ब्रह्म; एव: ही; तेन: उसके द्वारा; गन्तव्यम्: प्राप्त करने योग्य; ब्रह्मकर्मसमाधिना: ब्रह्म में कर्म की समाधि (एकता) रखने वाले।

हिंदी अनुवाद

अर्पण करने की क्रिया ब्रह्म है, हवि (आहुति) ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा हवन किया गया है – इस प्रकार ब्रह्म में कर्म की समाधि (एकता) रखने वाले उस (पुरुष) द्वारा ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है।

English Translation

Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman indeed shall be attained by one who always sees Brahman in action.

टीका / Commentary

यह श्लोक अद्वैत भाव से कर्म करने का सर्वोच्च स्तर है। कर्ता, कर्म, क्रिया, साधन, फल – सब ब्रह्म ही हैं। ऐसी भावना से कर्म करने वाला ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।