ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 23

श्लोक २३ में उन गुणों का वर्णन है जिनसे कर्म विलीन हो जाते हैं।

संस्कृत श्लोक

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः | यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ||२३||

gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-cetasaḥ | yajñāya carataḥ karma samagraṃ pravilīyate ||23||

पदच्छेद / शब्दार्थ

गतसङ्गस्य: आसक्ति रहित; मुक्तस्य: मुक्त; ज्ञानावस्थितचेतसः: ज्ञान में स्थित चित्त वाले; यज्ञायाचरतः: यज्ञ के लिए आचरण करते हुए; कर्म: कर्म; समग्रम्: सम्पूर्ण; प्रविलीयते: विलीन हो जाता है।

हिंदी अनुवाद

आसक्ति से रहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित चित्त वाला, और यज्ञ के लिए आचरण करता हुआ – ऐसे पुरुष का सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाता है।

English Translation

To one who is devoid of attachment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, and who works for the sake of sacrifice (for the sake of God), the whole action is dissolved.

टीका / Commentary

ज्ञानी के चार गुण – आसक्तिरहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित चित्त, और यज्ञभाव से कर्म करने वाला। ऐसे व्यक्ति के सभी कर्म विलीन हो जाते हैं, अर्थात उनका कोई बंधनकारी फल नहीं रहता।