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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 23

अध्याय 4 · श्लोक 23

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः | यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ||२३||

gata-saṅgasya muktasya jñānāvasthita-cetasaḥ | yajñāya carataḥ karma samagraṃ pravilīyate ||23||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

गतसङ्गस्य: आसक्ति रहित; मुक्तस्य: मुक्त; ज्ञानावस्थितचेतसः: ज्ञान में स्थित चित्त वाले; यज्ञायाचरतः: यज्ञ के लिए आचरण करते हुए; कर्म: कर्म; समग्रम्: सम्पूर्ण; प्रविलीयते: विलीन हो जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आसक्ति से रहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित चित्त वाला, और यज्ञ के लिए आचरण करता हुआ – ऐसे पुरुष का सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाता है।

English Translation

To one who is devoid of attachment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, and who works for the sake of sacrifice (for the sake of God), the whole action is dissolved.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी के चार गुण – आसक्तिरहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित चित्त, और यज्ञभाव से कर्म करने वाला। ऐसे व्यक्ति के सभी कर्म विलीन हो जाते हैं, अर्थात उनका कोई बंधनकारी फल नहीं रहता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।