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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 22

अध्याय 4 · श्लोक 22

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||२२||

yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ | samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||22||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यदृच्छालाभसन्तुष्टः: यदृच्छा (बिना प्रयास) से प्राप्त लाभ में सन्तुष्ट; द्वन्द्वातीतः: द्वन्द्वों से रहित; विमत्सरः: मत्सर (ईर्ष्या) से रहित; समः: समान; सिद्धौ: सफलता में; असिद्धौ: असफलता में; च: और; कृत्वा: करके; अपि: भी; न: नहीं; निबध्यते: बंधता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

बिना प्रयास (अपने आप) प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता।

English Translation

Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी के और लक्षण – वह जो भी बिना माँगे मिल जाता है, उसी में संतुष्ट रहता है। वह द्वन्द्वों (सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि) से परे है। उसमें ईर्ष्या नहीं है। वह सफलता-असफलता में समान रहता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी बन्धनमुक्त रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।