ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 22

श्लोक २२ में ज्ञानी के समत्व के लक्षण बताए गए हैं।

संस्कृत श्लोक

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||२२||

yadṛcchā-lābha-santuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ | samaḥ siddhāv asiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||22||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यदृच्छालाभसन्तुष्टः: यदृच्छा (बिना प्रयास) से प्राप्त लाभ में सन्तुष्ट; द्वन्द्वातीतः: द्वन्द्वों से रहित; विमत्सरः: मत्सर (ईर्ष्या) से रहित; समः: समान; सिद्धौ: सफलता में; असिद्धौ: असफलता में; च: और; कृत्वा: करके; अपि: भी; न: नहीं; निबध्यते: बंधता है।

हिंदी अनुवाद

बिना प्रयास (अपने आप) प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता।

English Translation

Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound.

टीका / Commentary

ज्ञानी के और लक्षण – वह जो भी बिना माँगे मिल जाता है, उसी में संतुष्ट रहता है। वह द्वन्द्वों (सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि) से परे है। उसमें ईर्ष्या नहीं है। वह सफलता-असफलता में समान रहता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी बन्धनमुक्त रहता है।