श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 22

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 38 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||२२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
यदृच्छालाभसन्तुष्टः
यदृच्छा (बिना प्रयास) से प्राप्त लाभ में सन्तुष्ट
द्वन्द्वातीतः
द्वन्द्वों से रहित
विमत्सरः
मत्सर (ईर्ष्या) से रहित
समः
समान
सिद्धौ
सफलता में
असिद्धौ
असफलता में
च
और
कृत्वा
करके
अपि
भी
न
नहीं
निबध्यते
बंधता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बिना प्रयास (अपने आप) प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: कर्मयोग और अद्वैत चेतना का महामंत्र

सनातन संस्कृति और वैदिक वाङ्मय में भगवद्गीता का स्थान एक ऐसे दीपस्तंभ के रूप में है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और बंधनों से मुक्ति की ओर मनुष्य की यात्रा को सुगम बनाता है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता केवल युद्ध के मैदान में अर्जुन को दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, अपितु यह संपूर्ण मानवता के लिए जीवन जीने की एक पूर्ण कला, विज्ञान और दर्शन है। इस महान ग्रंथ का प्रत्येक श्लोक अपने आप में एक महामंत्र है, जो मानव मन की गहराइयों को झकझोर कर उसे उसकी मूल आध्यात्मिक पहचान से परिचित कराता है।

जब हम गीता के चतुर्थ अध्याय (ज्ञान कर्म सन्यास योग) और विशेष रूप से द्वादश या अष्टादश अध्यायों में प्रवेश करते हैं, तो हमें 'स्थितप्रज्ञ' और 'ज्ञानी भक्त' के ऐसे लक्षण मिलते हैं जो साधारण मानवीय सीमाओं से मीलों दूर, ब्रह्मांडीय चेतना में लीन होते हैं। प्रस्तुत श्लोक — "यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||२२||" — उसी परम चेतना की स्थिति का जीवंत वर्णन करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक ज्ञानी पुरुष इस भौतिक संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त रह सकता है। आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य हर पल तनाव, ईर्ष्या, अति-महकांक्षा और असफलता के भय से ग्रस्त है, यह श्लोक एक अचूक ओषधि की भांति कार्य करता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में जो सहज रूप से प्राप्त हो जाए, उसमें संतोष रखना, सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से ऊपर उठना, दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या न करना और हर परिस्थिति में समभाव बनाए रखना ही वास्तविक स्वतंत्रता है। इस आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक पक्षों का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे, जिससे पाठकगण अपने दैनिक जीवन में इस उपदेश को उतारकर एक शांत, सफल और आनंदमय जीवन की ओर अग्रसर हो सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

[श्रीमद्भगवद्गीता — चतुर्थ अध्याय, श्लोक 22 / चतुर्थ एवं ज्ञानयोग संदर्भ]

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।। २२ ।।

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक पद के स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान दें। 'यदृच्छालाभसन्तुष्टः' का विच्छेद 'यदृच्छा + लाभ + संतुष्टः' होता है। इसका सस्वर पाठ मन को एकाग्र करने और मानसिक उद्वेग को शांत करने में अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार निहित है। आइए, इसका विस्तृत विश्लेषण एक संरचित तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यदृच्छालाभसन्तुष्टः जो बिना मांगे, दैवयोग से या अनायास प्राप्त होने वाले लाभ से ही संतुष्ट रहता है। अतिरिक्त धन या वस्तुओं के लिए कृत्रिम दौड़ न लगाकर, ईश्वर द्वारा सहज रूप से जो आजीविका या वस्तु मिल जाए, उसी में संतोष मानना। यह तृष्णा का नाश करता है।
द्वन्द्वातीतः जो सुख-दुःख, मान-अपमान, शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों से पूरी तरह परे (मुक्त) हो चुका है। संसार के विपरीत स्वभाव वाले अनुभवों (जैसे सर्दी-गर्मी या सुख-दुःख) से मानसिक स्तर पर विचलित न होना और अपनी आंतरिक स्थिति को स्थिर रखना।
विमत्सरः जो ईर्ष्या या मत्सरता (दूसरों की उन्नति देखकर जलने की भावना) से रहित है। दूसरों के सुख, वैभव या ज्ञान को देखकर हृदय में जलन का भाव न लाना, बल्कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा के दर्शन कर मुदित होना।
समः जो सर्वत्र समान भाव रखने वाला है, जिसके लिए कोई प्रिय या अप्रिय नहीं है। समत्व की वह अवस्था जहाँ राग और द्वेष दोनों समाप्त हो जाते हैं। साधक हर परिस्थिति को भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण करता है।
सिद्धौ कार्य की सफलता में, मनोवांछित फल की प्राप्ति होने पर। कर्म का परिणाम जब अनुकूल हो, तब अहंकार या अति-उत्साह से मुक्त रहना और इसका श्रेय परमात्मा को अर्पित करना।
असिद्धौ कार्य की असफलता में, मनचाहा परिणाम न मिलने पर। कर्म का परिणाम प्रतिकूल होने पर शोक, निराशा या क्रोध से ग्रस्त न होना और अपनी साधना से विचलित न होना।
च और (उपरोक्त सभी गुणों से युक्त होते हुए)। इन सभी आंतरिक और बाहरी विशेषताओं का एक ही व्यक्ति में एक साथ समन्वित रूप से पाया जाना।
कृत्वा अपि समस्त प्रकार के कर्मों को भली-भांति करते हुए भी। संसार से भागकर सन्यासी बनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह पूरी निष्ठा से करते रहना।
न निबध्यते वह कर्मों के बंधनों में नहीं बंधता, कर्मफल से अलिप्त रहता है। कर्म उसके लिए पुनर्जन्म का कारण नहीं बनते, अपितु वे कर्म उसके मोक्ष और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वह जीवनमुक्त हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के युद्धारंभ से जुड़ी है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब कौरवों के अधर्म और अहंकार के विरुद्ध पांडव धर्म की रक्षा के लिए खड़े थे। अर्जुन, जो कि स्वयं महान धनुर्धर और योद्धा थे, अपने सगे-सम्बन्धियों को सामने देखकर भयंकर मोह और विषाद से घिर गए। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगा और उन्होंने युद्ध करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्णा ने उन्हें उपदेश देना आरंभ किया, जिसे हम 'गीताोपदेश' के नाम से जानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इस संदर्भ में, भगवान उन महापुरुषों का चरित्र चित्रण करते हैं जो संसार में रहकर भी संसार से ऊपर उठ चुके होते हैं। पुराणों और वेदों में ऐसे कई ऋषियों और राजाओं का वर्णन मिलता है, जैसे राजा जनक, जिन्होंने राजपाट संभालते हुए भी 'विदेह' (देह से मुक्त और संसार के बंधनों से परे) की स्थिति को प्राप्त किया था। राजा जनक का जीवन इस श्लोक का सबसे बड़ा प्रमाण था। वे बड़े से बड़े राज्य का संचालन करते थे, न्याय करते थे, यज्ञ और अनुष्ठान करवाते थे, परंतु उनके मन में किसी प्रकार का मोह, लोभ, ईर्ष्या या असफलता का भय नहीं था।

शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि महर्षि वेदव्यास ने जब महाभारत की रचना की, तो उन्होंने कुरुक्षेत्र के इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया कि सच्चा धर्म जंगलों में जाकर भागना नहीं है, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए अपने भीतर की चेतना को जागृत करना है। 'यदृच्छालाभसन्तुष्टः' का अर्थ कोई दरिद्रता या लाचारी नहीं है, बल्कि यह भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति (अटैचमेंट) का त्याग है। जब मनुष्य समझ जाता है कि यह संसार अनित्य है और सब कुछ ईश्वर का है, तब उसके जीवन से ईर्ष्या, द्वंद्व और बंधन स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस महान श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

सुख-दुःख और सफलता-असफलता के द्वंद्वों से ऊपर उठने के कारण साधक का मन हमेशा शांत और स्थिर रहता है। आधुनिक जीवन के तनाव, एंग्जाइटी और डिप्रेशन से मुक्ति पाने में यह श्लोक रामबाण औषधि का काम करता है।

2. ईर्ष्या और द्वेष का शमन (विमत्सरता)

दूसरों की प्रगति को देखकर जलने की प्रवृत्ति (मत्सर) समाप्त हो जाती है। हृदय में सबके प्रति प्रेम, करुणा और सद्भाव का विस्तार होता है, जिससे साधक समाज में अत्यंत लोकप्रिय और आदरणीय बनता है।

3. कर्मफल के बंधनों से मुक्ति (कर्मयोग)

जब व्यक्ति कर्म करते हुए भी फल की आसक्ति से मुक्त रहता है, तब उसके द्वारा किए गए कर्म उसके पुनर्जन्म का कारण नहीं बनते। वह जीवनमुक्त की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

संतोष और समत्व के अभ्यास से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों और विचारों को दूर रखता है.

5. आत्मविश्वास और स्थिरता

सफलता में अहंकार न होना और असफलता में हताश न होना — यह गुण व्यक्ति को हर परिस्थिति में अडिग रखता है। उसका आत्मविश्वास किसी भी बाहरी परिस्थिति से डगमगाता नहीं है.

6. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति

जो भक्त भगवान के इस प्रिय संदेश को अपने आचरण में उतारता है, वह भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत प्रिय बन जाता है। उसे भगवान की अहैतुत कृपा सहज रूप से प्राप्त होने लगती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' (चतुर्थ अध्याय, श्लोक 22) तथा आचार्य शंकर और स्वामी रामसुखदास जी महाराज के प्रामाणिक भाष्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि आधुनिक पाठकों को प्राचीन वैदिक ज्ञान सरल, सुबोध और तार्किक हिंदी में प्राप्त हो सके। इस लेख में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या अप्रमाणिक दावों का समर्थन नहीं किया गया है, अपितु वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों के अकाट्य सिद्धांतों को ही प्रकाश में लाया गया है ताकि साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

बिल्कुल नहीं! "यदृच्छालाभसन्तुष्टः" का अर्थ आलसी बनना या पुरुषार्थ छोड़ना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कि अपने नियत कर्म पूरी ईमानदारी से करने के बाद, दैवयोग से जो परिणाम या धन प्राप्त हो जाए, उसमें अत्यधिक लालच या तृष्णा न रखना। यह मन की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति धन या वस्तुओं का गुलाम नहीं बनता, बल्कि अपने संतोषी स्वभाव से आनंदित रहता है।

सफलता मिलने पर अहंकार या घमंड में न आना और असफलता मिलने पर अत्यधिक शोक, निराशा या क्रोध से ग्रस्त न होना ही 'सम' रहना कहलाता है। एक ज्ञानी पुरुष समझता है कि कर्म करना उसके हाथ में है, परंतु परिणाम विभिन्न परिस्थितियों और ईश्वर की व्यवस्था पर निर्भर करता है। इसलिए वह दोनों ही स्थितियों में अपनी मानसिक शांति बनाए रखता है।

हाँ, श्लोक के उत्तरार्ध में स्पष्ट कहा गया है — "कृत्वापि न निबध्यते" यानी कर्म करते हुए भी वह नहीं बंधता। यदि कर्म आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार से मुक्त होकर लोककल्याण या ईश्वरार्पण की भावना से किए जाएं, तो वे कर्म बंधन का कारण न बनकर मुक्ति का साधन बन जाते हैं। राजा जनक इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण हैं।

'मत्सर' का अर्थ है ईर्ष्या, जलन या दूसरों की उन्नति सहन न कर पाना। 'विमत्सरः' वह है जो इस दुर्गुण से पूरी तरह मुक्त हो। आधुनिक स्पर्धा के युग में लोग दूसरों की सफलता से जलते हैं, जिससे उनका अपना मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक शांति नष्ट हो जाती है। विमत्सर होना हमें ईर्ष्या-मुक्त, उदार और संतुष्ट हृदय प्रदान करता है।

इस श्लोक का अभ्यास करने के लिए प्रतिदिन सुबह उठकर इसका सस्वर पाठ करना चाहिए। दिनभर कार्य करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि फल की चिंता करने के बजाय हमें अपना शत-प्रतिशत कर्म पर केंद्रित करना है। यदि कोई विपरीत परिस्थिति आए, तो उसे सहन करने की शक्ति ईश्वर से मांगें और हर हाल में अपने मन को शांत रखने का प्रयास करें।

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"योगः कर्मसु कौशलम्" — भगवद्गीता

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

बिना प्रयास प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता। Content with what comes without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound.

संतोष और समत्व / Contentment and Equanimity

यह श्लोक ज्ञानी के जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करता है – संतोष, समत्व, और सफलता-असफलता में समान भाव। यही कर्मबन्धन से मुक्ति का मार्ग है। This verse presents the life-philosophy of the wise – contentment, equanimity, and indifference to success and failure.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 22 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 22/42 52% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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