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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 21

अध्याय 4 · श्लोक 21

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||२१||

nirāśīr yata-cittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ | śārīraṃ kevalaṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

निराशीः: आशारहित; यतचित्तात्मा: चित्त और आत्मा (मन) को वश में किए हुए; त्यक्तसर्वपरिग्रहः: सब प्रकार के परिग्रह (संग्रह) का त्याग किए हुए; शारीरम्: शारीरिक; केवलम्: केवल; कर्म: कर्म; कुर्वन्: करता हुआ; न: नहीं; आप्नोति: प्राप्त करता; किल्बिषम्: पाप (बन्धन)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आशारहित, चित्त और आत्मा (मन) को वश में किए हुए, सब प्रकार के परिग्रह (संग्रह) का त्याग करके केवल शारीरिक कर्म करता हुआ भी वह पाप (बन्धन) को प्राप्त नहीं होता।

English Translation

Without hope, controlling the mind and the self, having abandoned all covetousness, and performing only bodily actions, one incurs no sin.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी के कर्म केवल शारीरिक स्तर पर होते हैं – देह से किए जाते हैं, पर मन से नहीं। वह आशारहित, मनोनिग्रही और संग्रह-त्यागी होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी बन्धन में नहीं पड़ता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।