ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 21

श्लोक २१ में ज्ञानी के कर्मों को केवल शारीरिक बताया गया है।

संस्कृत श्लोक

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||२१||

nirāśīr yata-cittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ | śārīraṃ kevalaṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam ||21||

पदच्छेद / शब्दार्थ

निराशीः: आशारहित; यतचित्तात्मा: चित्त और आत्मा (मन) को वश में किए हुए; त्यक्तसर्वपरिग्रहः: सब प्रकार के परिग्रह (संग्रह) का त्याग किए हुए; शारीरम्: शारीरिक; केवलम्: केवल; कर्म: कर्म; कुर्वन्: करता हुआ; न: नहीं; आप्नोति: प्राप्त करता; किल्बिषम्: पाप (बन्धन)।

हिंदी अनुवाद

आशारहित, चित्त और आत्मा (मन) को वश में किए हुए, सब प्रकार के परिग्रह (संग्रह) का त्याग करके केवल शारीरिक कर्म करता हुआ भी वह पाप (बन्धन) को प्राप्त नहीं होता।

English Translation

Without hope, controlling the mind and the self, having abandoned all covetousness, and performing only bodily actions, one incurs no sin.

टीका / Commentary

ज्ञानी के कर्म केवल शारीरिक स्तर पर होते हैं – देह से किए जाते हैं, पर मन से नहीं। वह आशारहित, मनोनिग्रही और संग्रह-त्यागी होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी बन्धन में नहीं पड़ता।