ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 20
श्लोक २० में ज्ञानी के कर्मों का स्वरूप बताया गया है – वह करता हुआ भी नहीं करता।
संस्कृत श्लोक
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ||२०||
tyaktvā karma-phalāsaṅgaṃ nitya-tṛpto nirāśrayaḥ | karmaṇy abhipravṛtto 'pi naiva kiñcit karoti saḥ ||20||
पदच्छेद / शब्दार्थ
त्यक्त्वा: त्यागकर; कर्मफलासङ्गम्: कर्मफल की आसक्ति को; नित्यतृप्तः: नित्य तृप्त; निराश्रयः: निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होना); कर्मणि: कर्म में; अभिप्रवृत्तः: लगा हुआ; अपि: भी; न: नहीं; एव: ही; किञ्चित्: कुछ भी; करोति: करता; सः: वह।
हिंदी अनुवाद
कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, नित्य तृप्त और निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होकर) वह कर्मों में लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
English Translation
Having abandoned attachment to the fruits of action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity.
टीका / Commentary
ज्ञानी का विलक्षण व्यवहार – वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता, क्योंकि उसका कर्तापन का अभिमान समाप्त हो चुका है। वह फलासक्ति से मुक्त, आत्म-संतुष्ट और स्वतंत्र है।