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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 20

अध्याय 4 · श्लोक 20

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ||२०||

tyaktvā karma-phalāsaṅgaṃ nitya-tṛpto nirāśrayaḥ | karmaṇy abhipravṛtto 'pi naiva kiñcit karoti saḥ ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्यक्त्वा: त्यागकर; कर्मफलासङ्गम्: कर्मफल की आसक्ति को; नित्यतृप्तः: नित्य तृप्त; निराश्रयः: निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होना); कर्मणि: कर्म में; अभिप्रवृत्तः: लगा हुआ; अपि: भी; न: नहीं; एव: ही; किञ्चित्: कुछ भी; करोति: करता; सः: वह।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, नित्य तृप्त और निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होकर) वह कर्मों में लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।

English Translation

Having abandoned attachment to the fruits of action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञानी का विलक्षण व्यवहार – वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता, क्योंकि उसका कर्तापन का अभिमान समाप्त हो चुका है। वह फलासक्ति से मुक्त, आत्म-संतुष्ट और स्वतंत्र है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।