ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में ज्ञानी पुरुष के लक्षण बताए गए हैं – कामना-संकल्प से रहित, ज्ञानाग्नि में दग्ध कर्म वाला।

संस्कृत श्लोक

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः | ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ||१९||

yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ | jñānāgni-dagdha-karmāṇaṃ tam āhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यस्य: जिसके; सर्वे: सब; समारम्भाः: आरम्भ (प्रयास); कामसङ्कल्पवर्जिताः: कामना और संकल्प से रहित; ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्: ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध (जले) कर्म वाले; तम्: उसे; आहुः: कहते हैं; पण्डितम्: पण्डित; बुधाः: ज्ञानी लोग।

हिंदी अनुवाद

जिसके सब आरम्भ (प्रयास) कामना और संकल्प से रहित हैं, और जिसके कर्म ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध (जले) हो गए हैं, उसे ज्ञानी लोग पण्डित (ज्ञानी) कहते हैं।

English Translation

He whose undertakings are all devoid of desires and selfish purposes, and whose actions have been burned by the fire of knowledge, the wise call him a sage.

टीका / Commentary

ज्ञानी की पहचान – उसके सभी प्रयास कामना और संकल्प से रहित होते हैं। ज्ञानाग्निदग्धकर्म का अर्थ है कि उसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जलकर भस्म हो गए हैं, अर्थात उनका कोई बंधनकारी फल नहीं बचता।