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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 18

अध्याय 4 · श्लोक 18

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||१८||

karmaṇy akarma yaḥ paśyed akarmaṇi ca karma yaḥ | sa buddhimān manuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsna-karma-kṛt ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्मणि: कर्म में; अकर्म: अकर्म; यः: जो; पश्येत्: देखता है; अकर्मणि: अकर्म में; च: और; कर्म: कर्म; यः: जो; सः: वह; बुद्धिमान्: बुद्धिमान; मनुष्येषु: मनुष्यों में; सः: वह; युक्तः: योगी; कृत्स्नकर्मकृत्: सम्पूर्ण कर्म करने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह युक्त (योगी) और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।

English Translation

He who sees inaction in action and action in inaction, he is wise among men; he is a yogi and performer of all actions.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह कर्म-अकर्म के रहस्य का सूत्र है। कर्म करते हुए भी अकर्म की स्थिति – अर्थात कर्तापन के अभिमान से मुक्त रहना, और अकर्म में भी कर्म – अर्थात निष्क्रिय रहते हुए भी कर्तव्य की भावना बनाए रखना। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी और योगी है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।