ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 17
श्लोक १७ में कृष्ण कर्म, विकर्म और अकर्म – तीनों को जानने की आवश्यकता बताते हैं।
संस्कृत श्लोक
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||१७||
karmaṇo hy api boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ | akarmaṇaś ca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ ||17||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कर्मणः: कर्म के स्वरूप को; हि: निश्चय ही; अपि: भी; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; च: और; विकर्मणः: विकर्म (निषिद्ध कर्म) को; अकर्मणः: अकर्म को; च: और; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; गहना: गहन है; कर्मणः: कर्म की; गतिः: गति।
हिंदी अनुवाद
निश्चय ही कर्म के स्वरूप को जानना चाहिए, और विकर्म (निषिद्ध कर्म) को जानना चाहिए, और अकर्म को भी जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है।
English Translation
For verily, the true nature of action (enjoined by the scriptures) should be known, as well as that of forbidden action (vikarma), and of inaction; the nature of action is hard to understand.
टीका / Commentary
कर्म के तीन भेद – कर्म (शास्त्र-विहित), विकर्म (निषिद्ध), और अकर्म (क्रियाशून्यता)। इन तीनों के स्वरूप को समझना आवश्यक है, क्योंकि कर्म का मार्ग अत्यन्त गूढ़ है।