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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 17

अध्याय 4 · श्लोक 17

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||१७||

karmaṇo hy api boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ | akarmaṇaś ca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्मणः: कर्म के स्वरूप को; हि: निश्चय ही; अपि: भी; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; च: और; विकर्मणः: विकर्म (निषिद्ध कर्म) को; अकर्मणः: अकर्म को; च: और; बोद्धव्यम्: जानना चाहिए; गहना: गहन है; कर्मणः: कर्म की; गतिः: गति।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

निश्चय ही कर्म के स्वरूप को जानना चाहिए, और विकर्म (निषिद्ध कर्म) को जानना चाहिए, और अकर्म को भी जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है।

English Translation

For verily, the true nature of action (enjoined by the scriptures) should be known, as well as that of forbidden action (vikarma), and of inaction; the nature of action is hard to understand.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कर्म के तीन भेद – कर्म (शास्त्र-विहित), विकर्म (निषिद्ध), और अकर्म (क्रियाशून्यता)। इन तीनों के स्वरूप को समझना आवश्यक है, क्योंकि कर्म का मार्ग अत्यन्त गूढ़ है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।