ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 16

श्लोक १६ में कृष्ण कर्म और अकर्म के गूढ़ रहस्य को बताने का वादा करते हैं।

संस्कृत श्लोक

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||१६||

kiṃ karma kim akarmeti kavayo 'py atra mohitāḥ | tat te karma pravakṣyāmi yaj jñātvā mokṣyase 'śubhāt ||16||

पदच्छेद / शब्दार्थ

किम्: क्या; कर्म: कर्म; किम्: क्या; अकर्म: अकर्म; इति: इस प्रकार; कवयः: विद्वान; अपि: भी; अत्र: इस विषय में; मोहिताः: मोहित हैं; तत्: वह; ते: तुमसे; कर्म: कर्म; प्रवक्ष्यामि: भलीभाँति कहूँगा; यत्: जिसको; ज्ञात्वा: जानकर; मोक्ष्यसे: मुक्त हो जाओगे; अशुभात्: अशुभ (बन्धन) से।

हिंदी अनुवाद

कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।

English Translation

What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil (of Samsara).

टीका / Commentary

कृष्ण एक गूढ़ विषय की ओर संकेत करते हैं – कर्म और अकर्म का रहस्य। साधारण बुद्धि से यह समझना कठिन है कि कर्म क्या है, अकर्म क्या है, और विकर्म क्या है। यह ज्ञान ही बन्धनमुक्ति का कारण है।