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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 16

अध्याय 4 · श्लोक 16

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||१६||

kiṃ karma kim akarmeti kavayo 'py atra mohitāḥ | tat te karma pravakṣyāmi yaj jñātvā mokṣyase 'śubhāt ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

किम्: क्या; कर्म: कर्म; किम्: क्या; अकर्म: अकर्म; इति: इस प्रकार; कवयः: विद्वान; अपि: भी; अत्र: इस विषय में; मोहिताः: मोहित हैं; तत्: वह; ते: तुमसे; कर्म: कर्म; प्रवक्ष्यामि: भलीभाँति कहूँगा; यत्: जिसको; ज्ञात्वा: जानकर; मोक्ष्यसे: मुक्त हो जाओगे; अशुभात्: अशुभ (बन्धन) से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।

English Translation

What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil (of Samsara).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण एक गूढ़ विषय की ओर संकेत करते हैं – कर्म और अकर्म का रहस्य। साधारण बुद्धि से यह समझना कठिन है कि कर्म क्या है, अकर्म क्या है, और विकर्म क्या है। यह ज्ञान ही बन्धनमुक्ति का कारण है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।