श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 16

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 43 मिनट का पठन 150 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||१६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
किम्
क्या
कर्म
कर्म
किम्
क्या
अकर्म
अकर्म
इति
इस प्रकार
कवयः
विद्वान
अपि
भी
अत्र
इस विषय में
मोहिताः
मोहित हैं
तत्
वह
ते
तुमसे
कर्म
कर्म
प्रवक्ष्यामि
भलीभाँति कहूँगा
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
मुक्त हो जाओगे
अशुभात्
अशुभ (बन्धन) से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का अद्वितीय स्थान है। इसे केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से निस्सृत वह अमृतवाणी माना जाता है, जो मानव मात्र को भवसागर से पार उतारने की सामर्थ्य रखती है। जब अर्जुन के मन में अपने स्वधर्म, कर्तव्य, युद्ध के औचित्य और उसके पाप-पुण्य जनित परिणामों को लेकर गहरी विडंबना उत्पन्न होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण उसे जीवन और जगत के सबसे सूक्ष्म, गूढ़ तथा जटिल सत्यों से परिचित कराते हैं। इसी श्रृंखला का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, दार्शनिक और क्रांतिकारी श्लोक चतुर्थ अध्याय (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) के अंतर्गत आता है— "किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||"।

यह श्लोक साधारण मानव के लिए ही नहीं, अपितु बड़े-बड़े ऋषियों, महर्षियों, मनीषियों और बुद्धिजीवियों के लिए भी एक शाश्वत पहेली की भाँति है। कर्म क्या है? अकर्म क्या है? और विकर्म क्या है? इन तीनों की सीमाएँ कहाँ मिलती हैं और कहाँ अलग होती हैं? इसे समझे बिना जीवन की सार्थकता को प्राप्त करना असंभव है। इस विस्तृत आलेख में हम भगवद्गीता के इस षोडश श्लोक (16वें श्लोक) के माध्यम से कर्मयोग के उस सर्वोच्च सिद्धांत को समझेंगे, जो मनुष्य को समस्त प्रकार के मानसिक बंधनों, कर्म-फलों और सांसारिक विकारों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश साधक को अकर्मण्यता (निष्क्रियता) से निकालकर 'निष्काम कर्म' के उस मार्ग पर स्थापित करता है जहाँ कर्म करते हुए भी मनुष्य कर्म के बंधनों से पूरी तरह अलिप्त रहता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भागवतगीता – चतुर्थोध्याय (ज्ञानकर्मसंन्यासयोग) - श्लोक १६

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत् ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ १६॥


संस्कृत पदच्छेद: किम् कर्म किम् अकर्म इति कवयः अपि अत्र मोहिताः। तत् ते कर्म प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा मोक्ष्यसे अशुभात्॥

श्लोक का सरल हिंदी पद्यानुवाद एवं भावार्थ:

हे अर्जुन! कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान और कवि भी भ्रमित हो जाते हैं (वे भी इसका सही निर्णय नहीं कर पाते)। इसलिए मैं तुझे वह यथार्थ कर्मतत्त्व भली-भांति समझाकर कहूँगा, जिसे अच्छी प्रकार जानकर तू इस संसार के समस्त अशुभ (कर्म-बन्धन और दुःखों) से मुक्त हो जाएगा।

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को पवित्र चित्त होकर भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप का ध्यान करना चाहिए। इस श्लोक का दैनिक तीन बार प्रातःकाल मानसिक या वाचिक जप करने से बुद्धि की जड़ता समाप्त होती है और कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक जागृत होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

वैदिक संस्कृत व्याकरण और अद्वैत दर्शन के दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का अत्यंत गहरा और बहुआयामी अर्थ है। आइए, एक विस्तृत तालिका के माध्यम से इसके हर एक पद को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
किम् क्या / कौन सा यह प्रश्नवाचक पद साधक के भीतर जिज्ञासा जगाता है कि वास्तव में सृजन और विघटन की प्रक्रिया में क्या उचित है।
कर्म विहित कार्य / क्रिया शास्त्र-सम्मत कर्तव्य, जो मनुष्य को लोक-कल्याण और मानसिक शुद्धि की ओर ले जाता है।
अकर्म अक्रियता या कर्म में अकर्म कर्म करते हुए भी फल की इच्छा का त्याग करना, जिससे क्रिया होने पर भी उसका कोई कार्मिक बंधन न बने।
इति इस प्रकार (इस विषय में) यह उस गंभीर विचार को रेखांकित करता है जिस पर युगों-युगों से दार्शनिक मंथन करते आए हैं।
कवयः विद्वान / मनीषी / ज्ञानी वे लोग जो वेदों, शास्त्रों और ब्रह्मांडीय नियमों के ज्ञाता माने जाते हैं, वे भी यहाँ भ्रमित हो जाते हैं।
अपि भी यह इस बात का द्योतक है कि साधारण मनुष्य तो दूर, उच्च कोटि के बुद्धिजीवी भी इस मायाजाल में उलझ जाते हैं।
अत्र इस विषय में (यहाँ) कर्म, अकर्म और विकर्म के इस अत्यंत सूक्ष्म और जटिल त्रिविध जाल के प्रसंग में।
मोहिताः मोहित / भ्रमित माया के प्रभाव से यह न तय कर पाना कि कौन सा कर्म बंधनकारक है और कौन सा मोक्षकारक।
तत् उस (रहस्य को) उस परम गोपनीय और कल्याणकारी ज्ञान को जिसकी प्राप्ति के बाद कोई संशय शेष नहीं रहता।
ते तुझसे / तेरे लिए भगवान श्रीकृष्ण अपने परम प्रिय सखा और शिष्य अर्जुन के प्रति वात्सल्य भाव व्यक्त करते हुए इसे प्रकट करते हैं।
प्रवक्ष्यामि भली-भांति कहूँगा श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष रूप से उस ज्ञान का उद्घाटन करने का आश्वासन देते हैं जो भवसागर से पार लगाता है।
यत् ज्ञात्वा जिसे जानकर सिर्फ सुनने या रटने से नहीं, अपितु आचरण और आत्मबोध में उतारने से वास्तविक मुक्ति मिलती है।
मोक्ष्यसे तू मुक्त हो जाएगा समस्त प्रकार के मानसिक संतापों, कर्म फल के बंधनों और पुनर्जन्म के चक्र से सदा के लिए आज़ाद होना।
अशुभात् अशुभ से / पाप या दुःख से संसार के तमाम दुखों, अज्ञान, भय, और आवागमन रूपी महा-अशुभ से पूर्णतः छुटकारा पाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के चतुर्थ अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभिक क्षणों का है, जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं (जैसे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य) तथा भीष्म पितामह को युद्धभूमि में देखकर తీవ్ర मानसिक विषाद से घिर जाते हैं। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष छूटने लगता है और वे युद्ध न करने का निर्णय लेते हुए अपने को अकर्मण्यता (सन्यास) की ओर धकेलना चाहते हैं। अर्जुन का यह सोचना था कि युद्ध करना पाप है, हिंसा है, और इससे नरक की प्राप्ति होगी; अतः युद्ध से दूर रहना ही श्रेष्ठ और धर्मसम्मत है।

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस भ्रम को तोड़ते हैं। अर्जुन जिसे 'अकर्म' या 'संन्यास' (युद्ध न करना) समझ रहे थे, वह वास्तव में पलायनवाद और स्वधर्म का त्याग (विकर्म) था। भगवान श्रीकृष्ण ने इतिहास और वेदों के माध्यम से यह समझाया कि इस ब्रह्मांड में एक क्षण के लिए भी कोई भी प्राणी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) निरंतर जीवों से कार्य कराते हैं। ऐसे में यदि कोई शरीर से निष्क्रिय बैठा रहे, किंतु उसका मन विषयों में आसक्त है, तो वह पाखंडी है। इसके विपरीत, जो कर्मयोग की मर्म को समझकर अपने नियत कर्तव्य का पालन करता है, वह गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी अकर्म (कर्मफल से निर्लिप्तता) की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और विशेषकर भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भागवतगीता का यह संवाद सनातन ज्ञान परंपरा का मेरुदण्ड है। प्राचीन काल में बड़े-बड़े महर्षि जैसे जनक, सनतकुमार, नारद और व्यास भी कर्म के इस जटिल चक्र पर विचार करते रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन कि "कवयोऽप्यत्र मोहिताः" यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक ज्ञान की गहराई इतनी असीम है कि केवल भौतिक बुद्धि या तार्किक क्षमता से इसे नहीं समझा जा सकता; इसके लिए ईश्वरीय कृपा, गुरु का सान्निध्य और निष्काम साधना की अनिवार्य आवश्यकता होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेक प्रकार के अप्रतिम आध्यात्मिक, मानसिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक स्पष्टता और निर्णय क्षमता में वृद्धि

जीवन के बड़े और कठिन मोड़ों पर जब दुविधा की स्थिति उत्पन्न होती है, तब इस श्लोक का चिंतन मन से भ्रम के बादलों को हटाकर सही निर्णय लेने की आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

2. कर्म-फलों की आसक्ति से मुक्ति

मनुष्य का अधिकांश दुःख भविष्य की चिंता और फल की आशा से जुड़ा होता है। इस श्लोक के दर्शन को अपनाने से व्यक्ति 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' के सिद्धांत पर सहज रूप से आसीन हो जाता है।

3. कार्मिक शुद्धि (कर्म बंधनों से मुक्ति)

जब साधक कर्तापन के अहंकार को छोड़कर अपने सभी कार्य ईश्वरार्पण की भावना से करता है, तब उसके पुराने और नए कर्मों के बंधन स्वतः कटने लगते हैं, जिससे कार्मिक अकाउंट शुद्ध होता है।

4. तनाव, चिंता और अवसाद से शांति

अकर्म और कर्म के सही तालमेल को समझने वाला व्यक्ति कभी भी डिप्रेशन या ओवरथिंकिंग का शिकार नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि परिणाम पर उसका नियंत्रण नहीं, केवल कर्म पर है।

5. सकारात्मक ऊर्जा औरा (Aura) का विकास

भगवान श्रीकृष्ण के इन वचनों के नियमित जप और मनन से मनुष्य के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक कंपन वाला सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र विकसित होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

6. अहंकार का शमन और नम्रता की प्राप्ति

"मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ" (कर्तापन का भाव) मनुष्य के पतन का मुख्य कारण है। इस श्लोक का बोध यह सिखाता है कि हम सब केवल निमित्त मात्र हैं, वास्तविक कर्ता सर्वोच्च सत्ता है।

7. आध्यात्मिक जागृति और विवेक की प्राप्ति

यह श्लोक साधक की बुद्धि को सूक्ष्मातिसूक्ष्म विषयों को समझने योग्य बनाता है, जिससे उसे नश्वर और अनश्वर, सत्य और असत्य का भेद स्पष्ट रूप से समझ आने लगता है।

8. भगवत्कृपा और मोक्ष की प्राप्ति

जब मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भगवान को समर्पित हो जाता है, तब उसे सहज रूप से भगवान की अहेतुकी कृपा और अंततः भवसागर से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in की संपादकीय नीति के अनुसार, हमारे पाठकों को वेदों, उपनिषदों, पुराणों और ऐतिहासिक महाकाव्यों का शुद्ध, विश्लेषणीय और मूल परंपरा के अनुरूप ज्ञान प्रदान करना हमारा परम कर्तव्य है। प्रस्तुत आलेख को तैयार करते समय श्रीमद्भागवतगीता के विभिन्न प्रसिद्ध भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य कृत भाष्य, स्वामी रामसुखदास जी महाराज की 'गीता प्रवचन', और स्वामी ज्ञाननानंद जी के संकलन) का गहन अध्ययन किया गया है।

यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री इस बात को सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक कोई भी भ्रमित करने वाली या सतही जानकारी न पहुँचे। कर्म, अकर्म और विकर्म का यह सिद्धांत भारतीय दर्शन का वह स्तंभ है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान और नेतृत्व शास्त्र (Leadership Science) में भी पूरी तरह प्रासंगिक माना गया है। यदि आपको इस श्लोक या इसके अर्थ को समझने में कोई भी संशय हो, तो किसी योग्य वेदांती गुरु या आचार्य के सान्निध्य में इसका अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

शास्त्र-सम्मत नियमों के अनुसार कर्तव्य का पालन करना 'कर्म' कहलाता है। इसके विपरीत, शारीरिक रूप से कार्य न करने पर भी मानसिक स्तर पर फल की आसक्ति का त्याग करना या उस स्थिति में रहना जहाँ कर्म का कोई बंधन उत्पन्न न हो, उसे 'अकर्म' कहते हैं। वहीं, शास्त्रों द्वारा निषेध किए गए या पापकर्म जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं, उन्हें 'विकर्म' कहा जाता है। इन तीनों की सूक्ष्म गति को समझना ही गीता का मुख्य उद्देश्य है।

इसका कारण यह है कि साधारण बुद्धि और बौद्धिक चातुर्य से लोग यह मान लेते हैं कि जो व्यक्ति चुपचाप बैठा है, वह अकर्मी (संन्यासी) है और जो काम कर रहा है, वह सांसारिक बंधनों में जकड़ा हुआ है। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत होती है—कई बार शांत बैठा व्यक्ति मानसिक रूप से गहरे विकारों और कर्मों में उलझा होता है, जबकि सक्रिय कर्मयोगी भीतर से पूरी तरह मुक्त होता है। इस उलझन को सुलझाना केवल तार्किक बुद्धि के बस का नहीं है, इसीलिए मनीषी भी भ्रमित हो जाते हैं।

इस श्लोक का नियमित स्मरण मनुष्य के भीतर कर्तव्यपरायणता और निष्काम भाव को जागृत करता है। इससे कार्यस्थल या परिवार में जिम्मेदारियों का निर्वाह करते समय तनाव, क्रोध और फल की चिंता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति अपने हर कार्य को सर्वोच्च सत्ता को समर्पित करते हुए पूरी ईमानदारी से करता है, जिससे उसका मानसिक संतुलन और आन्तरिक आनंद बना रहता है।

निश्चित रूप से! श्रीमद्भागवतगीता का प्रत्येक श्लोक मानवता के कल्याण के लिए है। इसके पाठ के लिए किसी विशेष दीक्षा या कठिन नियमों की आवश्यकता नहीं है। शुद्ध पवित्र मन से, श्रद्धा और भक्ति के साथ कोई भी व्यक्ति गीता के चतुर्थ अध्याय के इस श्लोक का पाठ और मनन कर सकता है।

यहाँ 'अशुभ' का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्टों या आपदाओं से नहीं है, बल्कि उस मूल अज्ञान (अविद्या) से है जो मनुष्य को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र, मानसिक संताप, कर्म-फलों के बंधन और सांसारिक दुखों में धकेलता है। कर्म के वास्तविक रहस्य को जान लेने पर यह सारा अज्ञान रूपी अशुभ नष्ट हो जाता है और साधक परम शांति को प्राप्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे। What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil of Samsara.

गूढ़ विषय / Profound Subject

यह श्लोक कर्म के गूढ़तम रहस्य की ओर संकेत करता है। केवल क्रिया करना कर्म नहीं है, और निष्क्रियता अकर्म नहीं है। इस गहरे रहस्य को समझना ही मुक्ति का मार्ग है। This verse introduces the profound mystery of action and inaction, the understanding of which leads to liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/42 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!