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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 15

अध्याय 4 · श्लोक 15

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः | कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ||१५||

evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvair api mumukṣubhiḥ | kuru karmaiva tasmāt tvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एवम्: इस प्रकार; ज्ञात्वा: जानकर; कृतम्: किया गया; कर्म: कर्म; पूर्वैः: पूर्वजों द्वारा; अपि: भी; मुमुक्षुभिः: मुमुक्षुओं (मोक्ष की इच्छा रखने वालों) द्वारा; कुरु: कर; कर्म: कर्म; एव: ही; तस्मात्: इसलिए; त्वम्: तू; पूर्वैः: पूर्वजों द्वारा; पूर्वतरम्: पहले; कृतम्: किया गया।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार जानकर, पूर्वज मुमुक्षुओं (मोक्ष की इच्छा रखने वालों) ने भी कर्म किया है। इसलिए तू भी वैसा कर्म कर, जैसा पूर्वजों ने पहले किया था।

English Translation

Having known this, the ancient seekers of freedom also performed action; therefore, do you also perform action, as the ancients did in days of yore.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण ऐतिहासिक उदाहरण देते हैं। जिन पूर्वजों ने मोक्ष की इच्छा रखी, उन्होंने भी यही मार्ग अपनाया – फलासक्ति रहित होकर कर्म किया। इसलिए अर्जुन को भी उसी मार्ग पर चलना चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।