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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 14

अध्याय 4 · श्लोक 14

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा | इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||१४||

na māṃ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛhā | iti māṃ yo 'bhijānāti karmabhir na sa badhyate ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; माम्: मुझको; कर्माणि: कर्म; लिम्पन्ति: लिप्त करते; न: नहीं; मे: मेरी; कर्मफले: कर्मफल में; स्पृहा: इच्छा; इति: इस प्रकार; माम्: मुझको; यः: जो; अभिजानाति: जानता है; कर्मभिः: कर्मों से; न: नहीं; सः: वह; बध्यते: बंधता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न ही मेरी कर्मफल में स्पृहा (इच्छा) है। इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बंधता।

English Translation

Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ईश्वर की विशेषता – वे कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि उनकी फल में आसक्ति नहीं। और जो साधक ईश्वर के इस स्वरूप को जान लेता है, वह भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।