ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 14
श्लोक १४ में कृष्ण कहते हैं कि कर्म उन्हें लिप्त नहीं करते, और न ही उनकी फल में इच्छा है।
संस्कृत श्लोक
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा | इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||१४||
na māṃ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛhā | iti māṃ yo 'bhijānāti karmabhir na sa badhyate ||14||
पदच्छेद / शब्दार्थ
न: नहीं; माम्: मुझको; कर्माणि: कर्म; लिम्पन्ति: लिप्त करते; न: नहीं; मे: मेरी; कर्मफले: कर्मफल में; स्पृहा: इच्छा; इति: इस प्रकार; माम्: मुझको; यः: जो; अभिजानाति: जानता है; कर्मभिः: कर्मों से; न: नहीं; सः: वह; बध्यते: बंधता है।
हिंदी अनुवाद
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न ही मेरी कर्मफल में स्पृहा (इच्छा) है। इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बंधता।
English Translation
Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.
टीका / Commentary
ईश्वर की विशेषता – वे कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि उनकी फल में आसक्ति नहीं। और जो साधक ईश्वर के इस स्वरूप को जान लेता है, वह भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।