ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 28

श्लोक २८ में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||२८||

dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare | svādhyāya-jñāna-yajñāś ca yatayaḥ saṃśita-vratāḥ ||28||

पदच्छेद / शब्दार्थ

द्रव्ययज्ञाः: द्रव्य-यज्ञ (द्रव्य के दान के यज्ञ); तपोयज्ञाः: तपो-यज्ञ; योगयज्ञाः: योग-यज्ञ; तथा: इस प्रकार; अपरे: अन्य; स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः: स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ; च: और; यतयः: यत्नशील; संशितव्रताः: दृढ़ व्रत वाले।

हिंदी अनुवाद

कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं।

English Translation

Others again offer wealth, austerity, and Yoga as sacrifice, while ascetics of self-restraint and rigid vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.

टीका / Commentary

यहाँ विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन है – द्रव्ययज्ञ (दान), तपोयज्ञ (तपस्या), योगयज्ञ (अष्टांग योग), स्वाध्याययज्ञ (शास्त्रों का अध्ययन), और ज्ञानयज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति)। सभी साधक अपनी योग्यता और अधिकार के अनुसार इनमें से किसी न किसी मार्ग को अपनाते हैं।