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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 28

अध्याय 4 · श्लोक 28

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||२८||

dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare | svādhyāya-jñāna-yajñāś ca yatayaḥ saṃśita-vratāḥ ||28||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

द्रव्ययज्ञाः: द्रव्य-यज्ञ (द्रव्य के दान के यज्ञ); तपोयज्ञाः: तपो-यज्ञ; योगयज्ञाः: योग-यज्ञ; तथा: इस प्रकार; अपरे: अन्य; स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः: स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ; च: और; यतयः: यत्नशील; संशितव्रताः: दृढ़ व्रत वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं।

English Translation

Others again offer wealth, austerity, and Yoga as sacrifice, while ascetics of self-restraint and rigid vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन है – द्रव्ययज्ञ (दान), तपोयज्ञ (तपस्या), योगयज्ञ (अष्टांग योग), स्वाध्याययज्ञ (शास्त्रों का अध्ययन), और ज्ञानयज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति)। सभी साधक अपनी योग्यता और अधिकार के अनुसार इनमें से किसी न किसी मार्ग को अपनाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।