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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 9

अध्याय 3 · श्लोक 9

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ||९||

yajñārthāt karmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ | tadarthaṃ karma kaunteya mukta saṅgaḥ samācara ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यज्ञार्थात्: यज्ञ के लिए किए गए कर्म से; अन्यत्र: भिन्न; लोक: संसार; अयम्: यह; कर्मबन्धन: कर्मों से बँधा हुआ है; तदर्थम्: उसके लिए (यज्ञ के लिए); कर्म: कर्म; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; मुक्तसङ्ग: आसक्ति रहित होकर; समाचर: भली-भाँति कर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह संसार (मनुष्य) बँध जाता है। अतः हे कुन्तीपुत्र! तू आसक्ति रहित होकर उस (यज्ञ) के लिए कर्म कर।

English Translation

Work done as a sacrifice (yajña) liberates one from bondage, but work done for any other purpose binds one to this world. Therefore, O son of Kunti, perform your prescribed duties without attachment, for the sake of sacrifice.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान कर्म-बन्धन से मुक्ति का रहस्य बताते हैं – कर्म को यज्ञ (ईश्वरार्पण) की भावना से करो। तभी वह बन्धनकारी नहीं होता। यह कर्मयोग का सार है। The Lord reveals the secret to freedom from bondage: perform work as a sacrifice (offering to the Lord). Only then does action not bind. This is the essence of Karma Yoga.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।